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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

अष्टादशोऽध्यायः। २६६
प्रष्टुर्विद्या हि सुदृढा प्रश्नो बीजं निरूपणे ॥ ५८ ॥
अप्रष्टुर्नैव विद्या स्यात् पृष्ट्वा विद्यात्ततो गुरुम् ।
चितिरेकैव वैचित्र्याद्भासते इति सम्भवेत् ॥ ५९ ॥
एकरूपो यथाऽऽदर्शः प्रतिबिम्बादनेकधा ।
पश्य स्वाप्नविकल्पादौ मन एकं हि केवलम् ॥ ६० ॥
द्रष्टृदर्शनदृश्यात्मवैचित्र्येण विभाति हि ।
एवं शुद्धैव सा संविद्विचित्राकारभासिनी ॥ ६१ ॥
चितिश्चेत्यमिति द्वेधा स्वप्नेऽपि हि विभासते ।
आलोकमन्तरा त्वन्धो भावं जानाति वै ननु ॥ ६२ ॥
अन्धस्याभासमानश्च रूपं भाति स्मृतौ किल ।
नैवं चितेरभाने किं कदा कुत्र विभासते ॥ ६३ ॥
सन्देहसे छूट सकता है ? विद्या तो पूछनेवालेकी ही पक्की होती है,
वास्तवमें प्रश्न ही निरूपणका बीज है। जो प्रश्न नहीं करता उसे
विद्या (ज्ञान) प्राप्त नहीं होती, अतः प्रश्न करके ही गुरुदेवसे विद्या
प्राप्त करनी चाहिये ॥ ५८-५९ पू० ॥
एक ही चैतन्य अनेकरूपोंमें भास रहा है—यह बात इसी प्रकार
सम्भव है जैसे दर्पण एकरूप होनेपर भी प्रतिबिम्बके कारण अनेकरूप
जान पड़ता है ॥ ५९ उ०-६० पू० ॥
देखो, स्वप्न और मनोराज्य आदिमें केवल एक ही मन द्रष्टा;
दर्शन और दृश्य आदि अनेक रूपोंमें भासता ही है। इसी प्रकार
वह संवित् शुद्ध होनेपर भी अनेक रूपोंमें भासनेवाली है। स्वप्नमें
भी चिति और चेत्य-ये दो भेद भासते ही हैं। [यदि यह द्वैत स्वप्नमें
मिथ्या है तो जाग्रत्में क्यों नहीं है ? ] ॥ ६० उ०-६२ पू० ॥
[तुमने कहा कि प्रकाश और घटादिके समान भासक और
भास्य दोनोंहीकी सत्ता है, सो यह बात नहीं है, क्योंकि घटादि
तो नेत्र या प्रकाश न होनेपर भी अन्य साधनोंसे भास जाते हैं; जैसे—]
अन्धा आदमी प्रकाश न होनेपर भी वस्तुओंको स्पर्शादिके द्वारा
जान ही लेता है तथा अन्धे आदमीको रूपका भान न होनेपर भी
स्मृतिमें उसका भान होता ही है; किन्तु चेतनके विषयमें ऐसी बात
नहीं है, चेतनका भान न होनेपर भला कब किसीको कहीं किसी वस्तु-
का भान हुआ है ? ॥ ६२ उ०-६३ ॥