त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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सर्वं हि जागतं वस्तु स्थिरमर्थक्रियाकरम् ॥ ५२ ॥
तदसत्यं कथं ब्रूहि यतोऽद्वैतं प्रसिद्ध्यति ।
सर्वं च भ्रान्तिविज्ञानं भ्रान्त्यभ्रान्तिभिदा कथम् ॥ ५३ ॥
भ्रान्तिः सर्वसमा वापि कथं स्याद् ब्रूहि मे गुरो ।
सन्देह एष विरतो हृदि मे परिवर्त्तते ॥ ५४ ॥
इत्येवं प्रश्नमाकर्ण्य दत्तात्रेयः समस्तवित् ।
साधुप्रश्नप्रहृष्टात्मा प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५५ ॥
राम साधु त्वया पृष्टं प्रोक्तप्रायमिदं पुनः ।
यावन्न मनसस्तोषस्तावद् भूयो विशोधयेत् ॥ ५६ ॥
गुरुर्वापि कथं ब्रूयादपृष्टस्तन्मनोगतम् ।
प्राणिनां हि बुद्धिभेदात्तर्कः पृथगवस्थितः ॥ ५७ ॥
अपृष्ट्वा स्वस्वाऽभिमतं कः सन्देहाद्विमुच्यते ।
नहीं देखा गया । किन्तु संसारके सब पदार्थ तो स्थिर हैं और उनके
द्वारा व्यवहार भी चल रहा है ॥ ५२ ॥
बताइये, वे असत्य कैसे हो सकते हैं, जिससे कि अद्वैतकी
सिद्धि हो । यदि सारा ज्ञान भ्रान्तिरूप है तो इसमें भ्रान्ति और अभ्रा-
न्तिका भेद भी कैसे होगा ? ॥ ५३ ॥
साथ ही, गुरुदेव ! यह भी बताइये कि यह भ्रान्ति सबको समान
रूपसे क्यों भासती है ? मेरे हृदयमें यह बड़ा भारी सन्देह चक्कर
काट रहा है” ॥ ५४ ॥
ऐसा प्रश्न सुनकर सर्वज्ञ दत्तात्रेयजीको इस सुन्दर प्रश्नके कारण
बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने कहना आरम्भ किया—॥ ५५ ॥
“परशुराम ! तुमने सुन्दर प्रश्न किया । ये बातें प्रायः कही जा
चुकी हैं । तथापि जबतक अपने मनको सन्तोष न हो तबतक बार-
बार इनपर विचार करना ही चाहिये ॥ ५६ ॥
यदि पूछा न जाय तो गुरु भी शिष्यके मनमें छिपे सन्देहके
विषयमें किस प्रकार कह सकते हैं । प्राणियोंकी बुद्धियाँ अनेक
प्रकार की हैं, अतः उनके समाधानके लिये युक्तियाँ भी अलग-
अलग हैं ॥ ५७ ॥
अतः अपने-अपने आशयके विषयमें प्रश्न किये बिना भला कौन