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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

१२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
तत्प्रष्टुं त्वाभिवाञ्छामि चिरसंशयितान्तरः ।
आज्ञप्तो भवताद्याहं पृच्छामि विचिकित्सितम् ॥ ६५ ॥
संश्रुत्यैवं भार्गवोक्तिं दत्तात्रेयो दयानिधिः ।
सम्प्रहृष्टमना राममूचे प्रीत्याथ भार्गवम् ॥ ६६ ॥
पृच्छ भार्गव यत्तेऽद्य प्रष्टव्यं चिरसम्भृतम् ।
तव भक्त्या प्रसन्नोऽस्मि प्रब्रवीमि तवेप्सितम् ॥ ६७ ॥
इति श्रीमदितिहासोत्तमे त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
भार्गवप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः।
उसके कारण चिरकालसे मेरा अन्तःकरण संशयापन्न रहता है,
वह मैं आपसे पूछना चाहता हूँ। यदि आज्ञा हो तो आज आपसे
अपनी शंका पूछूँ ॥ ६५ ॥
परशुरामका ऐसा कथन सुनकर दयानिधि दत्तात्रेयजीका हृदय
आनन्दित हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर भृगुनन्दन परशुरामसे
कहा ॥ ६६ ॥
'भार्गव ! तुम्हारे चित्तमें चिरकालसे जो प्रश्न बसा हुआ है वह
पूछो। मैं तुम्हारे भक्तिभावसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहते हो वह
मैं बताऊँगा' ॥ ६७ ॥
प्रथम अध्याय समाप्त ।