त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः । ११
वत्सोत्तिष्ठ चिरादद्य त्वां पश्यामि समागतम् ।
ब्रूहि स्वात्मभवं वृत्तं निरामयतया स्थितम् ॥ ५८ ॥
अथोत्थाय गुरूक्त्या स गुर्वादिष्टाम्यविष्टरः ।
उपविश्य प्रसन्नात्मा बद्धाञ्जलिपुटोऽब्रवीत् ॥ ५९ ॥
श्रीगुरो ! करुणासिन्धो ! त्वत्कृपामृत आप्लुतः ।
कथं स परिभूयेत विधिसृष्टैरथामयैः ॥ ६० ॥
त्वत्कृपात्मामृतकरमण्डलान्तःस्थितन्तु माम् ।
सन्तापयेत्कथं व्याधिश्चण्डांशुरतिभीषणः ॥ ६१ ॥
आन्तरं बाह्यमपि ते कृपयानन्दितं मम ।
सदा स्थितं किन्तु भवत्पादाब्जवियुतिं विना ॥ ६२ ॥
नान्यद्रुजावहं किञ्चिदासीन्मे लेशतः क्वचित् ।
तद्भवच्चरणाम्भोजदर्शनादद्य वै पुनः ॥ ६३ ॥
सम्पूर्णता सदापन्ना सर्वथा श्रीगुरो ननु ।
तत् किञ्चिच्चिरसंवृतं हृदि मे परिवर्तते ॥ ६४ ॥
[ फिर कहने लगे-] 'बेटा ! उठो । आज बहुत काल पश्चात् भेंट
हुई । अपना वृत्तान्त सुनाओ । स्वस्थ तो रहे ?' ॥ ५८ ॥
गुरुदेवके इस प्रकार कहनेपर परशुराम उठे और उनके बतलाये
हुए आसनपर बैठकर प्रसन्न चित्तसे हाथ जोड़कर बोले ॥ ५९ ॥
'करुणासागर गुरुदेव ! जो आपके कृपामृतमें डुबकी लगा चुका है
वह विधाताके रचे रोगादिसे कैसे आक्रान्त हो सकता है ॥ ६० ॥
मैं तो आपके कृपामय चन्द्रमण्डलके भीतर स्थित हूँ।
फिर व्याधिरूप अत्यन्त भीषण भास्कर मुझे कैसे सन्तप्त कर
सकता ? ॥ ६१ ॥
मैं तो बाहर-भीतर सर्वदा आपकी कृपासे आनन्दित हूँ।
आपके चरणकमलोंके वियोगके सिवा और किसी व्याधिका मुझे
कभी कहीं लेशमात्र भी पता नहीं है। सो आज आपके चरणारविन्दों-
का दर्शन करके वह कमी भी सब प्रकार पूरी हो गयी है। तथापि बहुत
दिनोंसे एक बात मेरे हृदयमें खटकती रहती है ॥ ६२-६४ ॥