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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 404 में से

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पृष्ठ 186

१७२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
ऊर्ध्वं विष्वक् च संपश्यन् नभो भीममनन्तकम् ।
भीतः प्राह मुनेः पुत्रं मुने मां न परित्यज ॥ ८० ॥
परित्यक्तो विनश्यामि पतिष्येऽहं निराश्रये ।
इति भीतं नृपं दृष्ट्वा प्रहस्याऽऽह मुनेः सुतः ॥ ८१ ॥
परित्यज भयं भूप नोत्सृजामि निशामय ।
एनं शैलान्तरस्थानं लोकं धैर्येण सर्वतः ॥ ८२ ॥
अथ धैर्यं समालम्ब्य नृपः समवलोकयन् ।
अधो दूरे सनक्षत्रमभ्रमन्धतमोवृतम् ॥ ८३ ॥
प्रविश्य तं देशमपि ततोऽधस्तात् प्रपश्यत् ।
चन्द्रमण्डलमास्फीतं तत्राऽऽगत्य जडीकृतः ॥ ८४ ॥
चन्द्रमण्डलशीतेन मुनिपुत्रेण रक्षितः ।
अथ प्राप्य सूर्यलोकं तत्करैरभितापितः ॥ ८५ ॥
मुनिपुत्रेण योगेन शिशिरीकृतदेहकः ।
अपश्यल्लोकमखिलं स्वर्लोकप्रतिविम्ववत् ॥ ८६ ॥
उसने देखा कि मुनिपुत्र उसे बड़े भारी आकाशमें पकड़े ले जा रहा
है ॥ ७७-७६ ॥
अपने ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर अति भयानक एवं असीम
आकाश ही देख कर वह डर गया और मुनिपुत्रसे बोला, “मुने ।
मुझे छोड़ मत देना । आप छोड़ देंगे तो मैं इस निराधारमें गिरकर मर
जाऊँगा” । इस प्रकार राजाको भयभीत देखकर मुनिकुमारने हँसकर
कहा—॥ ८०-८१ ॥
“राजन् ! भय छोड़ दो, मैं छोडूंगा नहीं । यह शिलाके भीतर
स्थित लोक है । इसे धैर्यपूर्वक सब ओर देखो” ॥ ८२ ॥
अब राजाने धैर्य धारणकर देखा तो उसे बड़ी दूरीपर नक्षत्रोंके सहित
अन्धकारसे आच्छादित आकाश दिखायी दिया ॥ ८३ ॥
उस प्रदेशमें भी घुसकर जब नीचेकी ओर देखा तो बड़ा विशाल
चन्द्रमण्डल दीख पड़ा । वहां पहुँचकर वह चन्द्रलोककी ठंडसे अकड़
गया । तब मुनिपुत्रने उसकी रक्षा की ॥ ८४-८५ पू० ॥
फिर जब सूर्यलोकमें पहुँचा तो वह सूर्यकी किरणोंसे झुलसने लगा ।
तब मुनिपुत्रने योगद्वारा उसके शरीरको शीतल किया । उसे वह सारा