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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 404 में से

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पृष्ठ 185

द्वादशोऽध्यायः । १७१
नेतव्यस्तं सर्वथैव पितुर्वचनगौरवात् ।
तदत्र देहं विन्यस्य कोटरे तृणसंवृते ॥ ७३ ॥
मनोमात्रशरीरः सन् शैलं विश मया सह ।
इत्युक्तः प्राह नृपतिरशक्तो देहनिर्गमे ॥ ७४ ॥
कथं मुने देहमिममुत्सृजामि समीरय ।
उत्सृजामि यदि बलात्नाशमेष्यामि सर्वथा ॥ ७५ ॥
एवं वदन्तं नृपतिं प्रहस्याह मुनेः सुतः ।
अहो योगानभिज्ञोऽसि चाऽस्तु नेत्रे निमीलय ॥ ७६ ॥
इत्युक्त्वा मीलिताक्षं तं प्रविश्य निमिषार्द्धतः ।
आकृष्य तल्लिङ्गतनुं क्षिप्त्वा श्वभ्रे च तत्तनुम् ॥ ७७ ॥
योगसामर्थ्यतः शैले निविश्य नृपसंयुतः ।
सुषुप्तं देहवैकल्यात् स्वसङ्कल्पोत्थदेहके ॥ ७८ ॥
संयोज्य बोधयामास प्रबुद्धो नृपतिस्तदा ।
गृहीतं मुनिनाऽपश्यत् स्वं महागगने तदा ॥ ७९ ॥


तथापि पिताजीकी आज्ञाके कारण किसी भी प्रकार तुम्हें ले
चलना ही होगा । अतः तुम घास-फूससे ढके हुये इस गढ़ेमें अपना
शरीर रख दो और केवल मनोमय शरीरसे मेरे साथ शिलामें चले
आओ” ॥ ७३-७४ पू० ॥
ऐसा कहे जानेपर राजा बोला, “मैं शरीरसे बाहर आनेमें
असमर्थ हूँ । मुने ! बताओ तो, मैं किस प्रकार इस शरीरको
छोड़ूँ । यदि इसे बलपूर्वक छोड़ भी दूँ तो मेरा तो सर्वथा नाश हो
जायगा” ॥ ७४ उ०-७५ ॥
राजाके ऐसा कहनेपर मुनिकुमार हँसकर बोला, “अरे ठाक, तुम
तो योग नहीं जानते । अच्छा, तुम आँखें मूंद लो” ॥ ७६ ॥
मुनिपुत्र ऐसा कहकर, राजाके आँख मूँद लेनेपर, आधे पलमें ही
उसके भीतर घुस गया । उसने राजाके लिंग शरीरको बाहर खींचा
और स्थूल शरीरको गढ़ेमें डाल दिया फिर अपने योगबलसे राजाके
सहित शिलामें घुस गया । देहसे पृथक् हो जानेके कारण इस समय
राजाका लिंग शरीर अचेत था । उसे अपने संकल्पसे बनाये हुए
शरीरसे संयुक्त करके सावधान किया तो राजा सचेत हो गया ! तब