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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 160

१४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां कार्यकारणनिश्चयात् ।
संवादतः प्रवृत्तीनां कथमाकस्मिकं भवेत् ॥ ११ ॥
क्वचित्तु कारणेऽदृष्टेऽप्यदृष्टं कल्प्यमेव तत् ।
बहूनामनुरोधो हि न्याय्यः सर्वैरुदाहृतः ॥ १२ ॥
भूयो दृष्टं सपूर्वं हि कार्यं क्वचिददर्शने ।
दृष्टवत्परिकल्प्यं स्यादन्यथा सार्वलौकिकी ॥ १३ ॥
सम्प्रवृत्तिर्विरुध्येत तस्मात्सर्वं सकारणम् ।
अत एव कार्यहेतोः किंचित्कारणतत्परः ॥ १४ ॥
सर्वत्र दृश्यते लोकस्तस्मादेतन्न किंचन ।
केचिदाहुरसत्कल्पैरणुभिः कार्यमुद्यतम् ॥ १५ ॥
तेभ्योऽत्यन्तं विभिन्नं चाप्यसदत्यन्ततो भवेत् ।
[ कार्यमें कारणकी सत्ता रहती है, कारणके बिना कार्य होता
ही नहीं ] इस अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा भी कार्य-कारण भावका निश्चय
होता ही है। इस नियममें कभी कोई अन्तर भी नहीं पड़ता। ऐसी
स्थितिमें यह आकस्मिक ( अनियत ) कैसे हो सकता है ॥ ११ ॥
कहीं-कहीं कारण देखनेमें नहीं आता, वहाँ अदृष्ट कारणका
अनुमान कर लेना चाहिये, क्योंकि जो बहुमत होता है उसे स्वीकार
करना सभीने न्यायानुुकूल माना है ॥ १२ ॥
अधिकांश वस्तुएँ तो कारणपूर्वक ही देखी जाती हैं। इसलिये
यदि कहीं कारण दिखायी न दे तो अन्यत्र देखे हुए कारणोंकी तरह वहाँ
भी कारणकी कल्पना कर लेनी चाहिये। नहीं तो जो प्रवृत्ति सर्वत्र
देखी जाती है उससे विरोध होगा। इसलिये सब पदार्थ कारणपूर्वक
ही हैं ॥ १३-१४ पू० ॥
इसीलिये जब कोई कार्य करना होता है तो सभी जगह लोग
उसकी साधनसामग्री जुटानेमें तत्पर देखे जाते हैं। अतः यह स्वभाव-
वाद [ कि संसार बिना कारणके स्वयं उत्पन्न हो गया ] कुछ भी नहीं
है ॥ १४ उ०-१५ पू० ॥
कोई ( परमाणुवादी नैयायिक ) कहते हैं कि यह कार्यरूप जगत्
असत्तुल्य ( अव्यक्त एवं जड ) परमाणुओंसे बना है। किन्तु यह
[ व्यक्त और सद्रूप होनेके कारण ] उनसे अत्यन्त भिन्न है। तथापि