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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

एकादशोऽध्यायः । १४५
शृणु राम प्रवक्ष्यामि दृश्यतत्त्वं यथास्थितम् ।
एतद् दृश्यमशेषं तु दृशिमात्रं न चेतरत् ॥ ६ ॥
अत्रोपपत्तिं वक्ष्यामि शृणु सम्यक्समाहितः ।
एतद् दृश्यं कार्यभूतमुत्पत्तेरुपलम्भतः ॥ ७ ॥
उत्पत्तिर्नूतनाभासः प्रतिक्षणमिदं जगत् ।
नूतनत्वेनैव भाति तत्क्षणोत्पत्तिमज्जगत् ॥ ८ ॥
केचित्प्राहुर्जगदिदमखण्डैकक्षणोद्भवम् ।
अन्ये पदार्थसंघातमयं स्थिरचरात्मकम् ॥ ९ ॥
सर्वथा तु समुत्पत्तिमदित्येव सुनिश्चितम् ।
तत्र स्वभाववादस्तु नोचितोऽतिप्रसङ्गतः ॥ १० ॥
परशुराम ! सुन, मैं तुम्हें यथार्थ रीतिसे इस दृश्यका रहस्य
बतलाता हूँ । यह सारा दृश्य दृङ्मात्र है, और कुछ नहीं ॥ ६ ॥
इसमें मैं तुम्हें युक्ति भी बताता हूँ, खूब सावधान होकर सुनो ।
यह दृश्य किसीका कार्य है, क्योंकि इसकी उत्पत्ति देखी जाती है ॥ ७ ॥
उत्पत्ति कहते हैं नवीनरूपसे प्रतीत होने को । यह जगत् प्रत्येक-
क्षणमें नवीन रूपसे ही भासता है; इसलिये यह क्षण-क्षणमें उत्पन्न
होनेवाला हुआ ॥ ८ ॥
कोई ( विज्ञानवादी ) तो इस जगत्को क्षण-क्षणमें उत्पन्न होने
वाला किन्तु अखण्डपरम्परा-युक्त मानते हैं। और कोई ( न्याय-वैशे-
षिक मतावलम्बी ) इसे आकाशादि स्थिर ( नित्य ) और घटादि चर
( अनित्य ) पदार्थोंका समूह बतलाते हैं ॥ ९ ॥
किन्तु सभी दृष्टियोंसे यह तो निश्चित है कि यह उत्पन्न होने-
वाला ही है। उत्पत्तिमें स्वभाववाद¹ माना नहीं जा सकता, क्योंकि
ऐसी स्थितिमें उत्पत्तिका कोई नियम नहीं रह सकेगा² ॥ १० ॥
१. बिना उपादान कारणके स्वतः उत्पन्न हो जाना ।
२. उत्पत्तिका यह नियम देखा जाता है कि एक विशेष उपादानसे किसी विशे
कार्यकी ही उत्पत्ति होती है । यदि ऐसा न हो तो मिट्टीसे घड़ा और तन्तुओंसे वस्त्र
ही क्यों उत्पन्न होता है ।