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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 404 में से

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पृष्ठ 139

नवमोऽध्यायः । १२५
अपश्यमन्धकारञ्च प्रकाशमन्यदेव च।
क्वचित् सुखं महत् प्राप्तं किमेतद्वद मे प्रिये ॥ ६५ ॥
इदमेवात्मनो रूपमथवाऽन्यद्भवेत् क्वचित् ।
सम्यग् विविच्य कथय यथा तमभिलक्षये ॥ ६६ ॥
इत्युक्ता साऽब्रवीद्धेमलेखा ज्ञातपरावरा ।
शृणु प्रिय प्रवक्ष्यामि समाहितधियाऽखिलम् ॥ ६७ ॥
यस्त्वया बाह्यसंरोधे व्यवसायः समेधितः ।
स शुभः सम्मतः सर्वैः सुमुख्यश्चात्मवेदिभिः ॥ ६८ ॥
विना तेन न तत् प्राप्तं केनापि कुत्रचित् क्वचित् ।
न तत् कारणतामेति तत्प्राप्तौ प्राप्तभावतः ॥ ६९ ॥
तब मैंने अन्धकार, प्रकाश और अन्य दृश्य देखे तथा कभी
मुझे बड़ा भारी सुख भी प्राप्त हुआ । प्रिये ! बताओ, यह सब क्या
था ? ॥ ६५ ॥
आत्माका स्वरूप क्या यही है, अथवा कुछ और है ? इसका
अच्छी तरह विवेचन करके निरूपण करो, जिससे मैं उसे अनुभव
कर सकूँ ॥ ६६ ॥
इस प्रकार कहे जानेपर परमात्मतत्त्वको जाननेवाली हेमलेखाने
कहा । "प्रियतम ! मैं सब रहस्य बतलाती हूँ, आप एकाग्रचित्त होकर
सुनें ॥ ६७ ॥
आपने जो बाह्य वृत्तियोंको निरोधका प्रयत्न किया यह तो बहुत
अच्छा है और सभी आत्मज्ञानी इसे मुख्य साधन मानते हैं ॥ ६८ ॥
उसके बिना तो किसीको कहीं भी कभी उस आत्मज्ञानकी
प्राप्ति नहीं हुई । परन्तु वह [ आत्मज्ञानकी ही प्राप्तिका कारण है ]
आत्माकी प्राप्तिका कारण नहीं, क्योंकि वह तो प्राप्त ही है१ ॥ ६९ ॥
१. जीवको अज्ञानवश आत्माकी अप्राप्तिका भ्रम हो रहा है। अतः किसी भी
साधनसे केवल अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है । स्वयं आत्मा तो प्राप्त ही है । यदि
साधनके द्वारा आत्माकी प्राप्ति मानी जायगी तो वह घटादिके समान जड,
परिच्छिन्न और अनात्मा सिद्ध होगा । अतः साधनका उपयोग अज्ञान की निवृत्तिमें
ही है, आत्माकी प्राप्तिमें नहीं ।