सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138

१२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
उन्मील्य नयने पार्श्वे समालोकयदास्थिताम् ।
आलोकिता प्रियं शीघ्रं प्रणयात् परिषस्वजे ॥ ५९ ॥
ततः प्राहऽमृतस्यन्दि सुन्दरं वचनं प्रिया ।
नाथ किं भवताऽऽहूता कच्चित्ते नीरुजं तनौ ॥ ६० ॥
वदाऽऽहूतौ कारणं मे यदर्थमहमागता ।
एवं प्रियानुयुक्तः स बभाषे स्वात्मनः प्रियाम् ॥ ६१ ॥
प्रिये त्वयाऽनुशिष्टोऽहं विविक्तेऽत्र समास्थितः ।
विचारपरमः स्वात्मरूपलक्षणहेतवे ॥ ६२ ॥
तत्परेणापि चित्तन्तु लक्षितं तत् पृथक् किमु ।
आत्मनः सर्वदा प्राप्तेर्भासमानत्वतोऽपि च ॥ ६३ ॥
असम्यग् भासनञ्चान्यभासनस्य निमित्ततः ।
इति मत्वा निरुध्यान्यभासनं सुव्यवस्थितः ॥ ६४ ॥
उसके एक ही आसनपर बैठ जानेपर राजकुमारने आधे निमेषमें ही
नेत्र खोल दिये और उसे अपने बगलमें बैठे देखा ॥ ५८-५९ पू० ॥
हेमचूडकी दृष्टि पड़ते ही उसने तुरन्त बड़े प्रेमसे उसका आलिं-
गन किया और फिर अमृतकी वर्षा-सी करनेवाले सुन्दर वचन
बोली ॥ ५९ उ०-६० पू० ॥
"नाथ ! आपने मुझे कैसे बुलाया ! आपका शरीर तो स्वस्थ
है न ? मुझे बुलानेका कारण बताइये, जिस निमित्तसे कि मैं यहाँ
आयी हूँ" ॥ ६० उ० ६१ पू० ॥
अपनी प्रियाके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वह उससे बोला,
"प्रिये ! तुम्हारा उपदेश सुनकर मैं यहाँ एकान्तमें अपने स्वरू-
पका साक्षात्कार करनेके लिये विचारमें तन्मय होकर बैठा
था ॥ ६१ उ०-६२ ॥
यद्यपि मेरा चित्त केवल आत्मचिन्तनमें ही निरत था और आत्मा
नित्य प्राप्त एवं प्रकाशस्वरूप भी है, फिर भी मुझे पृथक्-पृथक् दृश्य
क्यों दिखायी दिये ॥ ६३ ॥
फिर यह सोचकर कि यह असम्यक् प्रतीति अन्य पदार्थोंकी
प्रतीतिके कारण हुई है, मैं अन्य सभी प्रतीतियोंका निरोध करके स्थित
हो गया ॥ ६४ ॥