त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः । १११
तत् पुत्राद्या अपि च के मम वा ते क्व संवद ॥ १८ ॥
न तन्मया सुविदितं न तन्मन्ये मृषोदितम् ।
किन्तु त्वया निगदितं व्यपदेशेन सर्वथा ॥ १९ ॥
तद्विविच्य प्रकथय यथा ज्ञास्ये त्वहं स्फुटम् ।
अहं त्वां सुप्रसन्नोऽस्मि छिन्धि मे हृदि संशयम् ॥ २० ॥
एवमुक्ता हेमलेखा प्रसन्नवदनेक्षणा ।
मत्वा सुनिर्मलधियं परानुग्रहसंयुतम् ॥ २१ ॥
नूनमेषोऽतिविमुखो विषयेभ्योऽतिधैर्यतः ।
विष्णुशक्त्या महेशान्या फलितः पुण्यसञ्चयः ॥ २२ ॥
कालः प्रबोधने चायं बोधयामि ततस्त्विमम् ।
नाथ तेऽद्य महाभाग्यं प्राप्तमीशकृपावशात् ॥ २३ ॥
अन्यथा नैव विषयवैरस्यं पश्यति क्वचित् ।
उसका पति कौन थे ? उसके पुत्रादि कौन थे ? और बताओ, मुझसे
उनका कब सम्पर्क हुआ ॥ १८ ॥
मैं उस प्रसंगको ठीक-ठीक नहीं समझ सका । मैं ऐसा भी नहीं
मानता कि तुमने झूठ कहा होगा । किन्तु तुमने वह बात सर्वथा
सांकेतिक भाषामें कही है ॥ १९ ॥
तुम उसे स्पष्ट करके कहो, जिससे मैं साफ-साफ समझ जाऊँ ।
मैं तुमपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ, मेरे हृदयमें जो सन्देह है उसे दूर कर
दो" ॥ २० ॥
हेमचूड़के ऐसा कहनेपर हेमलेखाके मुख और नेत्र खिल गये ।
उसने समझ लिया कि परमात्मा की कृपासे सम्पन्न होकर इनकी बुद्धि
अत्यन्त शुद्ध हो गयी है ॥ २१ ॥
निश्चय ही अत्यन्त धैर्यपूर्वक ये विषयोंसे सर्वथा विमुख हैं । भगवती
विष्णुशक्ति की कृपासे इनके पुण्यपुञ्ज फलोन्मुख हो गये हैं ॥ २२ ॥
अब इनके तत्त्व-बोधका समय आ गया है, अतः मैं इन्हें
ज्ञानोपदेश करूँगी । [फिर बोली—] “नाथ ! भगवान्की कृपासे आपका
परम सौभाग्य उदय हुआ है ॥ २३ ॥
नहीं तो कहीं कोई विषयोंमें नीरसताका अनुभव नहीं कर सकता ।