त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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११० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
स्वप्ने वापि कुतोऽन्यत्र कुत एवमभूद्वद ।
कथं रात्रिस्त्वया नीता चैकापि युगसम्मिता ॥ १३ ॥
विना मां च क्षणोऽप्येको युगकल्पः सुदुःसहः ।
इत्युक्त्वा सा समाश्लिष्य खिन्नेवाभूत् क्षणं ततः ॥ १४ ॥
सोऽपि प्रियासमाश्लिष्टो नैषद्विकृतिमाययौ ।
प्राह प्रिये न मामेवं विमोहयितुमर्हसि ॥ १५ ॥
ज्ञाता मयाऽसि सुदृढं नास्ति ते शोककारणम् ।
परावरज्ञा त्वं धीरा मोहस्त्वां वै कथं स्पृशेत् ॥ १६ ॥
तत्त्वां प्रष्टुं समायातो यत्तद्वक्ष्यामि संशृणु ।
यत् प्राक् स्ववृत्तं कथितं तत् स्फुटं मे समीरय ॥ १७ ॥
का सा ते जननी प्रोक्ता सखी वा तत्पतिश्च कः ।
- मैं समझती हूँ जिसमें मेरी अनुमति न हो उस मार्गमें तो, जाग्रत्-
की तो बात ही क्या, आप स्वप्नमें भी नहीं जाते थे। मेरे बिना तो
आपको एक क्षण भी युग और कल्पके समान अत्यन्त दुःसह हो जाता
था। फिर बतलाइये ऐसा कैसे हुए ? आपने मेरे बिना युगके समान
एक रात्रि भी कैसे बिता दी। "ऐसा कहकर वह हेमचूड़से लिपट गयी
और फिर क्षणभरके लिये खिन्न-सी हो गयी ॥ १३-१४ ॥
किन्तु इसप्रकार अपनी प्रियासे आलिंगित होनेपर भी हेमचूड़को
कुछ भी विकार न हुआ। वह बोला, "प्रिये ! तुम्हें मुझे इस तरह
मोहमें नहीं डालना चाहिये ॥ १५ ॥
मैंने तुम्हें अच्छी तरह पहचान लिया है। तुम्हारे लिये शोकका
तो कोई भी कारण नहीं है, क्योंकि तुम कार्य-कारणस्वरूप पर ब्रह्मको
जाननेवाली और धैर्यशालिनी हो; मोह किस प्रकार तुम्हें स्पर्श कर
सकता है ॥ १६ ॥
इस समय मैं तुमसे जो पूछनेके लिये आया हूँ वह बताता हूँ,
सुनो। तुमने पहले जो मुझे आत्म-कथा सुनायी थी उसे स्पष्ट करके
मुझे समझाओ ॥ १७ ॥
तुमने अपनी वह माता कौन बतलायी थी ? तुम्हारी सखी और