तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २६ तिरुक्कुरळ् 75
२६. मांसाहार निषेध
२५१. अपने मांस की वृद्धि के लिए दूसरे प्राणी के शरीर का भक्षण
करनेवाला कैसे दयावान हो सकता है ?
२५२. धन की रक्षा न करनेवाले को धनी होने का सम्मान नहीं प्राप्त
हो सकता। उसी प्रकार मांसाहारियों को भी दयालु होने का
सम्मान नहीं प्राप्त हो सकता।
२५३. नाशकारी शस्त्रवाहक के मन के समान दूसरे जीव के शरीर के
भक्षक का मन भी सदय नहीं होता।
२५४. अहिंसा ही दया है, और हिंसा निर्दयता। मांस का भक्षण
ही अधर्म है।
२५५. मनुष्य का सशरीर जीवित रहना मांसाहार-निषेध के तत्त्व पर
आधारित है। अतः नरक भी मांसाहारी को मुक्त नहीं करेगा।
२५६ मांस-भक्षण के लिए लोग जीव-हत्या न करें तो मूल्य के लिए
मांस-विक्रय करनेवाला भी कोई नहीं रहेगा।
२५७. मांस-भक्षण कदापि नहीं करना चाहिए। विश्लेषण करके समझें
कि मांस दूसरे जीव का घाव ही तो है।
२५८. निर्दोष बुद्धिवाले व्यक्ति एक जीव के शरीर से पृथक होकर आये
हुए मांस का भक्षण नहीं करेंगे।
२५९. घृत की आहुति देकर किये गये सहस्र हवनों से श्रेष्ठ है जीवहत्या
एवं मांस-भक्षण न करना।
२६०. जो अहिंसक हो और मांस न खाता हो, उसको सभी जीव
कर-बद्ध प्रणाम करेंगे।