तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २० तिरुक्कुरळ 63
२०. प्रलाप न करना
१९१. दूसरों को प्रलाप से अप्रसन्न करनेवाला सबसे असम्मानित होगा।
१९२. अनेक व्यक्तियों के सम्मुख प्रलाप करना मित्रों के सम्मुख
अनुचित कर्म करने से भी तुच्छ है।
१९३. निरर्थक विषयों का किसी के द्वारा विस्तृत वर्णन बताता है कि
वह धर्मच्युत व्यक्ति है।
१९४. व्यर्थ एवं असभ्य प्रलाप अनेक व्यक्तियों से करना मनुष्य को
धर्म से दूर एवं हित से पृथक कर देगा।
१९५. सभ्य मानव प्रलाप करेगा तो उसकी श्रेष्ठता उसके सम्मान के
साथ शिथिल पड़ जायगी।
१९६ सदा प्रलाप करनेवाले को मानव न मानकर मानवों में
भूसा समझें।
१९७. अनुचिन बातें चाहे कह दें, परन्तु बुद्धिमानों का प्रलाप से
दूर रहना अच्छा है।
१९८. अति गम्भीर विषयों का विवेचन करनेवाले विद्वान विशेष अर्थ से
रहित वचन कभी व्यक्त नहीं करेंगे।
१९९. मायामुक्त पवित्र मानव भूलकर भी अर्थहीन शब्द मुँह से नहीं
निकालेंगे।
२००. शब्दों में हितकर शब्दों को कहो, अहितकर शब्दों को
कभी न कहो।