तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १९ तिरुक्कुरळ 61
१९. अपिशुनता
१८१. चाहे कोई धार्मिक वचनों को न कहे और अधर्म कर्म करे, पर
अपिशुन कहलाना अच्छा है।
१८२. धर्म के विरोध में बोलने और दुष्कर्मों को करने से भी अधम है
अनुपस्थित की निन्दा करना और उसके सम्मुख उसकी झूठी
प्रशंसा करना।
१८३. चुगली खाते हुए असत्यपूर्ण जीवन व्यतीत करने से निर्धन
रहकर मर-मिटना धर्म-ग्रन्थों में कथित सद्गति प्रदान करेगा।
१८४. समुपस्थित व्यक्ति से सक्रोध कुछ भी कह लो, परन्तु पीठ-पीछे
बिना विचारे एक शब्द भी न कहो।
१८५. किसी की पिशुनता के गुण से सिद्ध हो जाता है कि उसके
हृदय में धर्म-पथ पर चलने की शक्ति नहीं है।
१८६. दूसरों के दोषों का ही जो बखान करता है, उसके दोषों की
आलोचना दूसरे करेंगे, और वह निन्दित होगा।
१८७. आनन्दप्रद वार्ता से मैत्री स्थापित करने का गुण जिनमें नहीं है,
वे पिशुनता के कारण अपने मित्रों से भी वंचित हो जायेंगे।
१८८. आत्मीय व्यक्तियों के भी दोषों का सर्वत्र बखान करनेवाले,
अपरिचित के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह भगवान ही जाने।
१८९. अनुपस्थित देख किसी की निन्दा करनेवाले का भी भार पृथ्वी
मानो धर्म समझ कर ही सहन करती है।
१९०. दूसरों के दोषों के समान अपना दोष देखने लगे तो जीवमात्र को
कोई दुख भी हो सकता है ?