तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १७ तिरुक्कुरळ 57
१७. ईर्ष्या न करना
१६१. अपने हृदय में ईर्ष्या न करने के गुण को ही सदाचार समझना
चाहिए।
१६२. महत्तम गुणों में किसी से ईर्ष्या न करने से श्रेष्ठ कोई
नहीं है।
१६३. जो अपने लिए धर्म एवं उन्नति की इच्छा नहीं रखता वही
दूसरों की उन्नति देख प्रसन्न न होकर ईर्ष्या करेगा।
१६४. ईर्ष्या-पथ की बाधाओं को समझकर बुद्धिमानं उससे सम्भवित
अधार्मिक कर्मों को कदापि न करेंगे।
१६५. ईर्ष्या शत्रु के अभाव में भी बाधा उपस्थित कर सकती है, अतः
ईर्ष्यावान के नाश के लिए वही दुर्गुण यथेष्ट है।
१६६. सहायतार्थ दिया हुआ धन देखकर ईर्ष्या करनेवाले का कुटुम्ब
वस्त्र-भोजन बिना नाशमान होगा।
१६७. ईर्ष्यावान से देवी स्वयं ईर्ष्या करके अपनी ज्येष्ठा दरिद्रता को
उसे दिखा देती है।
१६८. ईर्ष्या नामक पापी सम्पत्ति का सर्वनाश करके व्यक्ति को दुर्मार्ग पर
धकेल ले जाता है।
१६९. ईर्ष्यावान की उन्नति एवं ईर्ष्याहीन सज्जन 'की अवनति
समीक्षा योग्य विषय हैं।
१७०. संसार में समृद्धि प्राप्त ईर्ष्यावान भी नहीं हैं, और समृद्धि से
गिरे हुए ईर्ष्या रहित सज्जन भी नहीं हैं।
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