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सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 334 में से

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पृष्ठ 60

अध्याय ७. तिरुक्कुरळ 37
७. सन्तान प्राप्ति
६१. प्राप्य वस्तुओं में बुद्धिमान सन्तान से बढ़कर हम अन्य किसी को
नहीं मानते ।
६२. यदि कोई निष्कलंक व सच्चरित्र सन्तान को जन्म दे तो सात जन्मों
तक कुकर्म उसे बाधित न करेंगे ।
६३. कहते हैं कि सन्तति ही किसी की सच्ची सम्पत्ति होती है । यह
सम्पत्ति उसके कर्मानुसार होगी ।
६४. अपनी सन्तान के छोटे करों द्वारा घोला हुआ साधारण सत्तू
अमृत से भी अधिक मधुर होता है ।
६५. सन्तान का तन-स्पर्श शरीर को तथा उनके तोतले बोल कानों को
सुख देते हैं ।
६६. बाँसुरी व वीणा की ध्वनि को वे ही मधुर कहेंगे जिन्होंने अपने
शिशु की तोतली बोली न सुनी हो ।
६७. पुत्र को सभा में अग्रिम स्थान में बैठने योग्य बनाना पिता की सबसे
बड़ी कृतज्ञता होगी ।
६८ सन्तान का अपने से अधिक बुद्धिमान होना विशाल, भूतल के सभी
व्यक्तियों को आनन्द प्रदान करना है ।
६९. अपने पुत्र को 'बुद्धिमान' सम्बोधित होते हुए सुनकर माता
पुत्र-जन्म के समय से अधिक आनन्द का अनुभव करती है ।
७०. पिता के प्रति पुत्र का प्रत्युपकार लोगों से यह कहलाना ही
है कि न मालूम इसके पिता ने ऐसे पुत्र की प्राप्ति के लिए
कैसा तप किया !