तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६. तिरुक्कुरळ 35
६. जीवन-संगिनी के गुण
५१. जीवन-संगिनी वही है जो गार्हस्थ्य के सद्गुणों से सम्पन्न हो और
अपने पति की आय के अनुकूल गृहस्थी चलावे ।
५२. गृहणी में गार्हस्थ्य-गुण नहीं तो किसी का जीवन कैसा ही श्रेष्ठ क्यों
न हो, सब व्यर्थ है ।
५३. गृहणी सद्गुण-सम्पन्न है तो गृहस्थ को किस वस्तु का अभाव ?
और यदि वैसी नहीं है तो उसके पास है ही क्या ?
५४. (गार्हस्थ्य-जीवन में) सुदृढ़ सतीत्व से युक्त स्त्री से बढ़कर महान
कौन-सी वस्तु है ?
५५. पूजा भगवान की नहीं, अपितु अपने पति की ही करती हुई, कोई
स्त्री उठती है तो उसके 'बरसो' कह देने पर ही वर्षा होगी¹ ।
५६. जो अपने सतीत्व की रक्षा करे, अपने पति के पोषण² में संलग्न
रहे, यथायोग्य सुयश को सँभाले रक्खे और (उपर्युक्त कार्यों को
सम्पन्न करने में) कभी शिथिल न पड़े वही स्त्री है ।
५७. घर की दीवारों में स्त्री को मर्यादित रखना किस काम का ?
वास्तविक मर्यादा तो उसका सतीत्व ही है ।
५८. यदि स्त्री पति के मन को अपना बना ले तो उसे देवलोक के
सकल वैभव अनायास ही प्राप्त हो जायेंगे ।
५९. पत्नी सुयश-प्रिय न हो तो पति अपमानित करनेवालों के आगे
पुरुष-सिंह के समान सिर ऊँचा करके नहीं चल सकता ।
६०. गृहणी का सद्गुण ही गृहस्थ की मांगलिक शोभा है और सुपुत्र
उसका आभूषण ।
- (दूसरा अर्थ) पूजा भगवान की नहीं, अपितु अपने पति की ही करती हुई
जो स्त्री उठती है वह (हमारी इच्छा व आवश्यकता के अनुकूल) 'बरसो'
कह देने पर बरसनेवाली वर्षा के समान है । - (दूसरा अर्थ) अपने पति का पूर्णतः अनुकरण करके उसे ही प्राप्त करनेवाली
स्त्री को स्वर्गीय-जीवन का श्रेष्ठ सुयश इसी जीवन में सिद्ध होगा ।