तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२१ तिरुक्कुरळ 269
१२१. एकाकी में स्मरण
१२०१. स्मरण भी अनन्त आनन्दप्रद होने के कारण प्रेम मद्य से भी
अधिक मधुर होता है ।
१२०२. प्रियतम के स्मरण मात्र से ही (वियोग-जनित) सम्पूर्ण दुःख
अगोचर हो जाते हैं । अतः प्रेम किसी भी मात्रा में
मधुर ही होता है ।
१२०३. छींक आती-आती रह गयी । क्या, प्रियतम मेरा स्मरण
करनेवाले जैसे बन कर अब स्मरण ही नहीं करते ?
१२०४. मेरे हृदय में वे अवश्य उपस्थित हैं । क्या मेरे लिए भी
उनके हृदय में स्थान है ?
१२०५. अपने हृदय से मुझे अलग रखनेवाले (प्रियतम) सतत मेरे
हृदय में प्रवेश करते क्या लज्जित नहीं होते ?
१२०६. उनके साथ मेरे संयोग के उन दिनों के स्मरण से ही
मैं जीवित हूँ, अन्यथा कैसे जीवित रहती ?
१२०७. विस्मरण ? यह मुझे अज्ञात है । उनका स्मरण ही
हृदय को उत्तत कर देता है तो उनके पूर्ण विस्मरण से
मेरी क्या दशा होगी !
१२०८. प्रियतम- का कितना ही स्मरण क्यों न करूँ, वे रुष्ट
न होंगे । यह है उनका श्रेष्ठ उपकार ।
१२०९. 'हम दो नहीं हैं', ऐसा कहनेवाले मेरे उस प्रियतम में
प्रेम के अभाव का स्मरण करके स्नेह-युक्त मेरे प्राण
सूखे जा रहे हैं ।
१२१०. हे चन्द्र ! अभिन्न रहकर अन्त में बिछुड़े हुए प्रियतम को मै जब
तक आँखों से न देख लूँ, तब-तक यहीं बने रहो ।