तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२० तिरुक्कुरळ 267
१२०. वियोग में विरहाधिक्य
११९१. बीज रहित प्रेम-फल को वे ही प्रेमिकाएँ प्राप्त करती हैं जिनके
प्रियतम भी समान प्रेम करते हैं।
११९२. जीवों के लिए मेघ-वर्षा के समान होता है प्रियतम का
: अपनी प्रेमिका के प्रति प्रेम।
११९३. प्रियतम का प्रेम प्राप्त प्रेमिका (वियोग में भी) अपने भावी
जीवन का विचार कर अवश्य गर्व करेगी।
११९४. प्रियतम का प्रेम प्राप्त न हो तो, लोक-सम्मानित होने पर भी
वे (प्रेमिकायें) सौभाग्यवती नहीं होतीं।
११९५. हम जिससे प्रेम करते हैं वह यदि स्वयं हम से प्रेम न करे तो
उससे हमारा क्या काम बनेगा ?
११९६. एक पक्ष का (प्रेम) निरानंद होता है; तुला के समान दोनों
ओर से समान होने पर ही आनन्दप्रद होता है।
११९७. मदन (उभय प्रेमियों में से) एक के पास ही स्थिर रहने के
कारण, क्या मेरे दुःख और दर्द को नहीं देखता ?
११९८. प्रियतम के मधुर शब्दों को प्राप्त न करके भी
संसार में जीवित रहनेवाली (मुझ जैसी) स्त्री से अधिक
कठोर हृदय कोई नहीं।
११९९. लौटकर प्रियतम के प्रेम न करने पर भी उनकी प्रशंसा को
सुनना मेरे कानों को मधुर प्रतीत होता है।
१२००. जियो मेरे हृदय ! अपने अपार दुःख को उस प्रेमहीन से व्यक्त
करते हो ! अच्छा हो, यदि समुद्र को सुखाने का
प्रयत्न करो (जो उससे सुलभ है) !