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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 334 में से

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पृष्ठ 290

अध्याय ११९ तिरुक्कुरळ 265
११९. पीलेपन की व्यथा
११८१. मैं स्वयं प्रियतम के बिछुड़ते समय सहमत हुई । अब अपने
पीलेपन की व्यथा किससे कहूँ ?
११८२. यह पीलापन उस प्रिमतम प्रदत्त होने के अहंकार के साथ मेरे
सम्पूर्ण शरीर पर फैलता जा रहा है ।
११८३. मेरा लावण्य एवं लज्जा तो वे ले गये, और प्रतिफल स्वरूप
विरह-वेदना और पीलापन मुझे दे गये ।
११८४. मैं उनके श्रेष्ठ गुणों का ही विचार और उनका ही गुण-गान
करती हूँ । तो फिर मुझ पर यह पीलापन क्यों ? यह धोखा
तो नहीं है ?
११८५. वह देखो ! प्रियतम मुझे छोड़े जा रहे हैं ! यह देखो ! मेरा
शरीर पीला पड़ता जा रहा है !
११८६. दीपक के लुप्त होने की प्रतीक्षा करनेवाले अन्धकार के समान
मेरे प्रियतम के गाढ़ालिंगन से अलग होने की प्रतीक्षा पीलापन
करता रहता है ।
११८७. गाढ़ालिंगन में बँधी पड़ी थी । क्षण मात्र के लिए अलग
हुई कि इतने में पीलेपन ने मानो मुझे निगल ही डाल ।
११८८. सब यही कहते हैं कि मैं पीली पड़ गयी । पर यह कहनेवाला
कोई नहीं कि मुझे वे छोड़कर चले गये ।
११८९. मना कर गये हुए मेरे प्रियतम सचमुच गुणी हैं तो मेरा
शरीर ऐसा ही पीलापन लिये रहे ।
११९०. यदि लोग मना कर गये हुए मेरे प्रियतम के वियोग की निन्दा
न करें तो मेरे पीलेपन की वार्ता प्रिय ही होगी ।
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