तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ११८ तिरक्कुरळ 263
११८. वेदनापूर्ण नेत्र
११७१. इन्हीं नेत्रों के दिखाने पर मेरे देखने से यह असह्य
काम-वेदना मुझे वाधित कर रही है, तो ये नेत्र स्वयं क्यों
विलाप करते हैं ?
११७२. जिन कामुक नेत्रों ने पूर्व विना विचारे देखा, वे ही अब
विश्लेषण किये विना दुःख का अनुभव क्यों करें !
११७३. उस दिन प्रियतम को नेत्रों ने स्वयं भागकर देखा था,
पर आज वे स्वयं विलाप कर रहे हैं । यह वस्तुतः
हास्यप्रद ही है ।
११७४. असह्य व अनन्त काम-वेदना मुझ में उत्पन्न करके मेरे
ये कामुक नेत्र स्वयं रो-रोकर सूख गये हैं ।
११७५. समुद्र से भी विशाल असह्य काम-वेदना उत्पन्न करनेवाले मेरे
ये नेत्र अब निद्राहीन हो वेदना से पीड़ित हैं ।
११७६. मुझ में इस प्रकार की काम-वेदना उत्पन्न करनेवाले मेरे
ये नेत्र अब दुःख से पीड़ित हैं । यह अच्छा ही हुआ ।
११७७. अत्यधिक काम-वश हो प्रियतम को देखनेवाले मेरे ये नेत्र अब
वेदना सह-सहकर अश्रुहीन रह जायँ !
११७८. हृदय के विना (केवल शब्दों से ही) प्रेम दिखानेवाले हैं वे ।
उन्हें न देख नेत्र अशाँत हैं ।
११७९. प्रियतम न आवें तो निद्रा नहीं आती; और अगर आ भी जायँ
तब भी नहीं आती । इनके मध्य में मेरे ये नेत्र
असह्य दुःख से पीड़ित हैं ।
११८०. ढिंढोरा पीटनेवाले मेरे जैसे नेत्र जिसके हों उनके हृदय की
गुप्त बातों को समझना दूसरों के लिए कठिन नहीं है ।