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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

अध्याय ११३ तिरुक्कुरळ 253
११३. प्रेम की महिमा
११२१. मधुरभाषिणी (प्रेमिका) के विशुद्ध दाँतों से उत्पन्न नीर मधु-
मिश्रित क्षीर के समान है।
११२२. शरीर और प्राण का जैसा सम्बन्ध प्रेमिका और मेरे
स्नेह में है।
११२३. मेरी आँख में उपस्थित हे पुतली ! ज़रा अपना स्थान रिक्त कर।
मेरी प्रेमिका के लिए अन्य कोई उपयुक्त स्थान नहीं है।
११२४. सुन्दर भूषणों से युक्त मेरी प्रेमिका संयोग में मेरे प्राण के लिए
जीवन के समान तथा वियोग में मृत्यु के समान है।
११२५. स्मरण तब करूँ यदि मै भूलूँ, पर युद्ध-रत नेत्रोंवाली अपनी
प्रेमिका के गुणों को भूलना मैं जानता ही नहीं।
११२६. प्रियतम नेत्रों से नहीं निकलेंगे, सूक्ष्म इतने हैं कि पलकों के
चलने पर भी दुखित नहीं होते।
११२७. प्रियतम नेत्रों के अन्दर हैं; अतः उनमें काजल भी नहीं
लगाती कि वे कहीं छिप न जायँ।
११२८. प्रियतम हृदय में हैं; अतः गरम वस्तु खाने से डरती हूँ कि
कहीं उसका ताप उन्हें न सतावे।
११२९. मैं पलकें सी नहीं मारती कि कही वहाँ उपस्थित प्रियतम
छिप न जायँ; इतने ही पर पुरवासी उन्हें हृदयहीन
कहते हैं।
११३०. मेरे हृदय में सदा प्रियतम सानन्द निवास करते हैं; परन्तु
पुरवासी उनकी निन्दा करते हैं कि वे हृदयहीन हैं।