तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ११२. तिरुक्कुरळ 251
११२. सौन्दर्य की सुप्रशंसा
११११. (न्यूनतम भार से युक्त तथा मृदुलतम) हे अनिच्चम पुष्प !
धन्य है तू और तेरी कोमलता; परन्तु हम जिसे आलिंगन
करते हैं वह प्रणयिनी तुझ से भी कहीं अधिक कोमल है।
१११२. हे हृदय ! सब लोग देखनेवाले सुमनों के सदृश अपनी
प्रेमिका के नेत्रों को मानकर स्वयं सुन्दर पुष्प देखो तो क्यों
व्याकुल होते हो ?
१११३. बाँस जैसी बाँहवाली इस बाला के लिए कोंपल ही शरीर, मोती
ही दाँत, सुगन्धि ही गन्ध तथा शूल ही अंजन-रंजित नेत्र हैं
१११४. कुमुदिनी देख ले तो इस बाला के नेत्रों की तुलना में अपने को
तुच्छ मानकर नत-मस्तक हो पृथ्वी की ओर निहारने लगेगी।
१११५. उसने अपने को बिना डण्ठल तोड़े अनिच्चम से आभूषित
कर डाला; अतः क्षीण लंक पर सुललित वाद्य न बजेंगे।
(अर्थात् कमर टूट गयी)।
१११६. चन्द्रमा तथा इस कन्या के मुख में अभेद के भ्रम में पड़कर
नक्षत्र आकाश में विचलित हो उठे हैं।
१११७. अपूर्ण से शनै-शनैः पूर्णता को प्राप्त उस चन्द्र के समान इस
कन्या के मुख पर कोई कलंक है ?
१११८. हे चन्द्र ! युग-युग जियो । यदि तुम इस कन्या के
मुख के समान प्रकाश प्रस्फुटित करो तो तुम्हें मेरा प्रेम
प्राप्त हो ।
१११९. हे चन्द्र ! यदि तुम सुमन सदृश नेत्रवाली मेरी सुन्दरी के
मुख की समानता चाहो तो सब के नेत्रों में मत पड़ो (केवल
मुझे दिखो)।
११२०. अनिच्चम तथा हंस-पंख इस कोमलांगी के पदों के लिए
कंटकपूर्ण गोखरू हैं।