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सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 334 में से

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पृष्ठ 274

अध्याय १११ तिरुक्कुरळ 249
१११. मिलन का सुख
११०१. रूप, शब्द, रस, गन्ध, स्पर्श—इन पाँचों का इन्द्रिय-सुख
एकत्रित हो प्रकाशपूर्ण चूड़ियों से भूषित इस बाला में
समाया हुआ है।
११०२. ज्वर की औषधि कोई अन्य वस्तु होती है, परन्तु इस
भूषण-भूषिता जनित ज्वर की औषधि यह वाला स्वयं है।
११०३. कमल-नयन का लोक, क्या कभी अपनी प्रेमिका के सुकोमल
स्कन्धों के आलिंगन से अधिक सुमधुर हो सकता है ?
११०४. पृथक् होने पर जलानेवाली और निकट पहुँचने पर ठण्डक
पहुँचानेवाली अग्नि इस बाला ने कहाँ से प्राप्त की ?
११०५. पुष्प-गुंथित केश से युक्त इस बालां के स्कन्ध इच्छित पदार्थों का
विचार करने पर उन्हीं का-सा आनन्द प्रदान करते हैं।
११०६. प्रत्येक स्पर्श प्राणों को नव-स्फूर्ति प्रदान करने के कारण
इस अबला के स्कन्ध सुधा से सृजित हैं।
११०७. इस सुवर्ण सुन्दर वाला का आलिंगन, अपने घर में अपने
पदार्थ को बाँटकर भोजन करने के समान है।
११०८. ऐसा आलिंगन कि मध्य में वायु भी न रह सके, प्रेमी-प्रेमिका
दोनों को सुमधुर होता है।
११०९. प्रणय-कलह, परिज्ञान, परिरम्भन—ये प्रेम-सम्पृक्त द्वारा प्राप्त
पारितोषिक हैं।
१११०. अधिकाधिक अध्ययन से अवगत अज्ञान-बोध के समान है
वह प्रेम का परिज्ञान जो प्रत्येक बार इस सुवर्णाभरण-भूषिता के
परिरम्भन से होता है।
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