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सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 334 में से

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पृष्ठ 270

अध्याय १०९ तिरुक्कुरळ 245
१. गुप्ते-प्रेम (पूर्वराग)
१०९. सौन्दर्य का चोट
१०८१. सुरबाला है. या सुघर मयूर ? कहीं स्वर्ण-कुण्डल-भूषिता मानवी
ही तो नहीं है ? विभ्रमित हो रहा है मेरा हृदय ।
१०८२. निहारते हुए उसके नयनों के समक्ष हो उसे निहारना मानो
सबल सैन्य से युक्त सुरबाला से स्वयं संग्राम करना है ।
१०८३. 'यम मुझे अज्ञात था, पर अब ज्ञात हुआ कि वह स्त्री वेश
धारी युद्धरत विशालाक्षी होता है ।
१०८४. देखनेवाले के प्राणों को केवल देखकर खाने के कारण
स्त्रीत्वयुक्त इस सरला के नेत्र कुछ विभिन्न ही हैं ।
१०८५. यम है या नेत्र या हरिणा ? इस बाला की दृष्टि में इन
तीनों के गुण उपस्थित हैं ।
१०८६. इसकी वक्र भुकुटी और न झुककर छाँह करती रहे तो इसके
नेत्र मुझे प्रकम्पित करनेवाली बाधा न पहुँचायेंगे ।
१०८७. बाला के उभरे हुए उरोजों पर पड़ा हुआ वस्त्र मदमत्त
गयन्द के शिरोभूषण सदृश है ।
१०८८. समर भूमि में शत्रु को भी भय-कम्पित करनेवाला मेरा बल
इस बाला के उज्ज्वल माथे के सम्मुख परास्त हो गया ।
१०८९. हिरणी की जैसी यौवन दृष्टि तथा लज्जा से युक्त इस बाला को
किसने और क्यों गहने पहनाये ?
१०९०. पान करनेवालों के अतिरिक्त तीखा मद्य काम के समान
देखनेवालों में उन्मत्तता नहीं उत्पन्न करता ।