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सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 334 में से

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पृष्ठ 264

अध्याय १०७ · तिरुक्कुरळ 239
१०७. याचना की भयंकरता
१०६१. छिपाये बिना सप्रसन्न देनेवालों से भी याचना न करना
(याचना करने से) करोड़ों गुना श्रेष्ठ है ।
१०६२. याचना करके भी जीवित रहना पड़े तो लोकस्रष्टा (याचकों के
समान) मारे-मारे फिरकर नाशवान होवे ।
१०६३. दरिद्रता के दुःख को याचना से दूर करने के अज्ञान से
बढ़कर अज्ञान और कोई नहीं है ।
१०६४. (जीवन के लिए) कहीं स्थान न होने पर भी याचना न
करने का सद्गुण सम्पूर्ण पृथ्वी की विशालता से
भी श्रेष्ठ है ।
१०६५. चाहे सूखी रोटी ही क्यों न हो, परिश्रम के स्वार्जित भोजन से
मधुर और कुछ नहीं होता ।
१०६६. चाहे गाय के लिए जल की ही याचना क्यों न हो, जिह्वा के
लिए याचना से बढ़कर निन्दास्पद और कुछ नहीं है ।
१०६७. याचना करने पर जो अपनी वस्तु को छुपाता है उससे कोई
किसी वस्तु की याचना न करे ।
१०६८. याचना नामक आश्रयहीन नाव छिपाव नामक चट्टान से
टकराने पर टूट जायगी ।
१०६९. याचना के विचार से हृदय द्रवीभूत होगा, और
छिपाव के विचार से हृदय प्राप्त-वस्तु भी खोकर विदीर्ण
हो जायगा ।
१०७०. 'नहीं' कहे जाने मात्र से याचक के प्राण चले जाते हैं, तो
छिपाकर 'नहीं' कहनेवाले के प्राण कहाँ छिपे रहेंगे ?