तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १०६ तिरुक्कुरळ २५४
१०६. याचना
१०५१. याचना करो तभी जब याचना के योग्य व्यक्ति दिख सकें;
यदि वे छिपावें तो निन्दा के पात्र वे हैं, न कि तुम।
१०५२. याचित वस्तु बिना दुख दिये प्राप्त हो तो याचना एक के
लिए आनन्दप्रद होती है।
१०५३. खुले हृदयवाले व कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति के सम्मुख खड़े होकर
याचना करने में एक सौन्दर्य होता है।
१०५४. जिन्हें स्वप्न में भी छिपाना अज्ञात है उनसे याचना करना भी
दान देने के समान (सुखद) होता है।
१०५५. खुले हृदयवाले संसार में होने के कारण उनके सम्मुख खड़े हो
याचना करनेवाले उस (याचना) प्रवृत्ति में लीन हैं।
१०५६. छिपाने के बुरे स्वभाव से रहित व्यक्ति के देखने पर
याचकों का सारा दुःख एक साथ नष्ट हो जायगा।
१०५७ निन्दा किये बिना दान देनेवाले को देखने पर याचकों का
हृदय प्रसन्न हो अन्दर ही अन्दर आनन्दित होता है।
१०५८. याचक न हों तो शीतल स्थलों से युक्त यह महान लोक
केवल कठपुतली के नृत्य के समान होता।
१०५९. याचना करके लेनेवाले ही न हों तो दानियों को यश
कैसे प्राप्त हो?
१०६०. या[चक] क्रोधित न हों। दारिद्रय का दुःख ...
न