तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 260, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १०५ तिरुक्कुरळ 235
१०५. दरिद्रता
१०४१. यदि पूछा जाय कि दरिद्रता के समान दुःखद वस्तु
क्या है तो कहना होगा, दरिद्रता के समान दुःखद
वस्तु दरिद्रता ही है।
१०४२. दरिद्रता नामक पापी आगामी तथा इस जन्म के सुखों का
लोप करता हुआ ही आवेगा।
१०४३. दरिद्रता नामक (दोष की) इच्छा परम्परागत कुलाचरण एवं
यश को एक साथ नाश कर देगी।
१०४४. दरिद्रता कुलीन में भी निन्दाजनक शब्दों को उत्पन्न
करानेवाली सुस्ती उत्पन्न कर देगी।
१०४५. दरिद्रता नामक दुःखद अवस्था में अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ
स्वयं आ उपस्थित होंगी।
१०४६. अच्छे विषय को विशिष्ट चिन्तन के पश्चात् कहने पर भी
दरिद्र का कथन निष्प्रभाव ही ठहरेगा।
१०४७. धर्म विरुद्ध दरिद्रताग्रस्त व्यक्ति अपनी माता से भी अन्य
व्यक्ति के समान देखा जायगा।
१०४८. प्राणों को हरनेवाली-सी कल की दरिद्रता, क्या आज
भी आ पड़ेगी? (दरिद्र के लिए यह प्रतिदिन का
विषम प्रश्न है।)
१०४९. आग में कोई सो भी सकता है, परन्तु दरिद्रता में कोई
किसी प्रकार भी आँख मूँदकर सो नहीं सकता।
१०५०. वह दरिद्र जिसके पास कोई भोग्य वस्तु न हो, पूर्णतः संन्यास
इसलिए नहीं ले पाता कि नमक और सूखी रोटी के लिए
वह यम है।