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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 334 में से

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पृष्ठ 258

अध्याय १०४- तिरुक्कुरळ 233
१०४. कृषि
१०३१. संसार कुछ भी करता फिरे, हल के पीछे ही (आश्रित) है।
अतएव दुखद होने पर भी कृषि-कर्म ही श्रेष्ठ है।
१०३२. कृषक सारे संसार के लिए किल्ली के समान है, क्योंकि वही
अन्य सभी का भार-वहन कर रहा है।
१०३३. कृषकों का जीवन ही जीवन है । अन्य सब दूसरों की वन्दना
करके भोजन पाकर उनके पीछे चलनेवाले ही हैं।
१०३४ अन्न की फली की छाया में रहनेवाला कृषक अनेक छत्रों की
छाया (से युक्त सम्राटों) को भी अपने छत्र के नीचे पावेगा।
१०३५. हाथ से काम करके भोजन करने का स्वभाव रखनेवाले
याचना नहीं करेंगे, और याचना करनेवाले को बिना छिपाये
कुछ देंगे ।
१०३६. कृषक हाथ मोड़ ले तो सभी इच्छाओं का त्यागी
कहलानेवाले का भी अस्तित्व नहीं रहेगा।
१०३७. सेर भर मिट्टी को (खूब जोतकर) पाव भर धूल बनाकर
सुखा डालो तो हाथ भर खाद के बिना भी अच्छी
फलस होगी।
१०३८. जोतने की अपेक्षा खाद डालना अच्छा है, और घास-पात
उखाड़ने के पश्चात् खेत की सिंचाई से अधिक आवश्यक है
उसकी सुरक्षा ।
१०३९. भूस्वामी अपनी भूमि (खेत) को चलकर न देखे तो वह भूमि
घृणा करके इसकी पत्नी के समान मान कर बैठेगी।
१०४०. 'अपने हाथ में कुछ नहीं है'—ऐसा मान कर जो सुस्त
बैठा रहता हो उसे देखकर भूमि रूपी सुन्दर स्त्री
मन ही मन हँसेगी ।
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