तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १०१ तिरुक्कुरळ २२७
१०१. प्रयोजनहीन सम्पत्ति
१००१. संग्रह की हुई बड़ी सम्पत्ति का भोग किये बिना मृत्यु प्राप्त
व्यक्ति उससे कर ही क्या सका ?
१००२. सम्पत्ति से सब कुछ सम्भव मानकर, दिये बिना उसे पकड़े रखने
की मादकता के फलस्वरूप तुच्छ जन्म प्राप्त होगा।
१००३. धन संग्रह में मस्त, यश की इच्छा से रहित व्यक्ति का जन्म
पृथ्वी के लिए भार है।
१००४. (किसी की सहायता न करने के कारण) जो किसी का
प्रिय न रहा हो, वह (अपनी मृत्यु के पश्चात् भी) शेष रहनेवाली
किस वस्तु का विचार करेगा ?
१००५. जो देता और भोगता नहीं है, उसके पास करोड़ों क्यों न
संग्रहित हों, सब व्यर्थ ही हैं।
१००६. जो स्वयं भी न भोगे और उपयुक्त व्यक्ति को भी कुछ न दे,
वह विशाल सम्पत्ति के लिए एक व्याधि है।
१००७. निर्धन को कुछ भी धन न देनेवाले की सम्पत्ति एक अति
सुन्दर रमणी का एकाकी रहकर वृद्ध होने के समान होता है।
१००८. (किसी की सहायता न करने के कारण) अप्रिय व्यक्ति की
सम्पत्ति नगर के मध्य में विष वृक्ष के फलने के समान
होता है।
१००९. (कृपणता के फलस्वरूप) दूसरों से प्रेम करना छोड़,
अपने को कष्ट देकर धर्म का भी अनुसरण न करनेवाले की
संग्रहित सम्पत्ति का भोग दूसरे ही करेंगे।
१०१०. यशस्वी धनवान की लघु निर्धनता में भी वर्षा की अत्यधिक
कमी के समान गुण होता है।