तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १०० तिरुक्कुरळ 225
१००. शिष्टाचार
९९१. कहते हैं कि सविनय वार्ता से शिष्टाचार नामक सदाचरण
की प्राप्ति सहज हो जाती है।
९९२. स्नेह-सम्पन्नता एवं श्रेष्ठ-कुल-जन्म—ये दोनों शिष्टाचर नामक
सदाचरण (के अंग) हैं।
९९३. शरीरांग-साम्य बन्धुजन-मेल नहीं है। स्थिर शिष्टाचार का मेल ही
वास्तविक मेल है।
९९४. न्याययुक्त कृतज्ञ हित-चिन्तक के शिष्टाचार का लोक
सम्मान करेगा।
९९५. हास्य में भी निन्दा नहीं रुचती। शत्रुता में भी व्यवहार-
कुशल में एक शिष्टता रहती है।
९९६. शिष्ट व्यक्तियों के सम्पर्क के कारण लोक टिका हुआ है;
अन्यथा वह मिट्टी में मिल जाता।
९९७. मानवीय-शिष्टता से रहित व्यक्ति, आरी के समान तीक्ष्ण बुद्धि से
युक्त होने पर भी, वृक्ष के समान होते हैं।
९९८. मैत्री को बनाये न रखनेवाले हानिप्रद व्यक्ति के साथ भी
शिष्टाचार न करना अगौरव की बात है।
९९९. जो प्रसन्नचित नहीं रहता उसके लिए विशाल संसार
दिन में भी अन्धकार से पूर्ण रहता है।
१०००. अशिष्ट व्यक्ति को प्राप्त बड़ी सम्पत्ति कलश-दोष के
फलस्वरूप स्वच्छ दूध के बिगड़ने के समान होती है।
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