सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 334 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 248

अध्याय ९९ तिरुक्कुरळ 223
९९. सर्वगुण-सम्पन्नता
९८१. कर्त्तव्य-बोध-युक्त सर्वगुण-सम्पन्न व्यक्ति के लिए सभी शुभ विषय
स्वाभाविक कर्त्तव्य कहे जाते हैं ।
९८२. गुण-सौन्दर्य को ही बुद्धिमान लाभप्रद मानते हैं । अन्य
सौन्दर्यों को वे, चाहे कितने की लाभप्रद क्यों न हों, महत्त्व
नहीं देते ।
९८३. प्रेम, लज्जा, सहयोग, दयार्द्रता तथा सत्य वचन—ये पाँच
शान्ति के स्तम्भ हैं।
९८४. अहिंसा ही तप है, और दूसरों के दोषों को न कहने में शान्ति
उपस्थित है ।
९८५. बलवान का बल उसकी विनयशीलता में है। शत्रुओं को
परिवर्तित करने के लिए बुद्धिमान का शस्त्र यही है ।
९८६. शान्ति की कसौटी वस्तुतः अपने से छोटों से हार मान
लेने में है ।
९८७. दुःख पहुँचानेवाले को सुख नहीं पहुँचाया तो सद्गुणों से
क्या प्रयोजन ?
९८८. सद्गुण नामक शक्ति प्राप्त होने पर निर्धनता कोई अगौरव का
विषय नहीं है ।
९८९. सर्वगुण-सम्पन्नता के कारण समुद्र माने जानेवाले व्यक्ति
प्रलयकाल में भी अपना सद्स्वभाव न तजेंगे ।
९९०. सर्वगुण-सम्पन्न की गुण-गरिमा में क्षति आ जाय तो यह
विशाल पृथ्वी भी अपना भार न उठा पायेगी ।