तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ९८ तिरुक्कुरळ 221
९८. महानता
९७१. व्यक्ति की श्रेष्ठता उसकी महत्वाकांक्षा ही है। इस भाव के
बिना रहने का विचार ही उसका नाश है।
९७२. सभी का जन्म एक जैसा ही होता है। कर्म-भेद के
आधार पर उनकी महानता एक जैसी नहीं होती।
९७३. ऊँची स्थिति में होने पर भी उच्च आचरण न हो तो वह श्रेष्ठ
नहीं होता। नीची स्थिति में होने पर भी निम्न आचरण न हो
तो वह नीचा नहीं होता।
९७४. एक ही पुरुष का विचार रखनेवाली स्त्री के समान अपने आप
को आचरण के अन्दर रखने पर ही महानता भी ठहरती है।
९७५. असाधारण कार्य उचित रीति से वे कर दिखायेंगे जो महानता के
गुणों से युक्त होंगे।
९७६. महान व्यक्ति का सप्रेम आदर करने का विचार (उनकी
महानता से अनभिज्ञ) तुच्छ व्यक्तियों में नहीं होता।
९७७. श्रेष्ठता भी आचरणहीन तुच्छ व्यक्ति के हाथ पड़ जाय तो
वह उसका दुष्प्रयोग ही करेगा।
९७८. महानता सदा विनय-सम्पन्न होती है। तुच्छता अपने आपको
श्रेष्ठ मानकर सदा गर्दन ऊँचा किये रहती है।
९७९. महानता अहंकार रहित होती है। तुच्छता अहंकार की
सीमा पर पहुँच जाती।
९८०. महानता दूसरों के दोषों को छिपाती है। तुच्छता दूसरों के
दोषों को ही निकाल कर कह डालती है।