तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
DevanagariHindipublished334 पृष्ठ
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- अध्याय ९६ तिरुक्कुरळ 217
७. वंश
९६. कुलीनता
९५१. ईमान एवं लज्जा का स्वाभाविक संयोग कुलीनों के अतिरिक्त
औरों में नहीं होता ।
९५२. सदाचार, सत्य एवं लज्जा—इन तीनों से कुलीन कभी
नहीं फिसलते ।
९५३. कुलीन व्यक्ति में प्रसन्न मुख, दान, मधुर बोल तथा दूसरों की
निन्दा न करना—ये चारों गुण स्वाभाविक होते हैं ।
९५४. करोड़ों रुपये प्राप्त होते रहने पर भी कुलीन व्यक्ति क्षुद्र कर्म
कभी न करेंगे ।
९५५. धन में कमी आ पड़ने पर भी परम्परागत कुलीन व्यक्ति अपने
सदाचरण से च्युत न होगा ।
९५६. अपने निर्दोष कुल के नाम को बनाये रखने के इच्छुक धोखे से
पूर्ण अनुचित व्यवहार कभी न करेंगे ।
९५७. कुलीन का दोष आकाश के चन्द्र में उपस्थित कलंक के
समान स्पष्टतः सब लोगों की दृष्टि में पड़ता है ।
९५८. सदाचरण के मध्य में निर्दयता व्यक्त हो तो उसकी कुलीनता में
सन्देह होने लगता है ।
९५९. भूमि के गुण को अंकुर दिखाता है । उसी प्रकार कुल के
गुण को दिखाती है कुलीन की वार्ता ।
९६०. शुभ की अभिलाषा हो तो सलज्ज होना आवश्यक है ।
कुल के सुनाम की अभिलाषा हो तो सविनय व्यवहार की
आवश्यकता है ।
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