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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 334 में से

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पृष्ठ 240

अध्याय ९५ तिरुक्कुरळ 215
९५. औषधि
९४१. विश्लेषण करके वैद्यों के द्वारा बताये हुए वात, पित्त, कफ़—
इन तीनों में से कोई अधिक अथवा कम होने पर भी
वीमारी करेगा।
९४२. शरीर को दिये हुए भोजन की पची हुई स्थिति का ध्यान रखकर
आगे भोजन किया जाय तो औषधि की आवश्यकता न हो।
९४३. भूख हो तो मात्रा का ध्यान रखकर भोजन करो। वही शरीर
प्राप्त व्यक्ति के लिए दीर्घजीवी होने का मार्ग है।
९४४. भूख का विचार करके सोच-समझकर उपयुक्त पदार्थों का सेवन
खूब भूख लगाने पर करो।
९४५. मात्रा का ध्यान रखकर उपयुक्त भोजन किया जाय तो प्राण के
लिए किसी प्रकार का भय नहीं है।
९४६. मित-भोजन करनेवाले के पास रहनेवाले स्वास्थ्य-सुख के
समान अति भोजन करनेवाले के पास बीमारी रहती है।
९४७. क्षुधाग्नि की मात्रा को न समझकर अधिक भोजन करने से
असीम बीमारी वाधित करेगी।
९४८. बीमारी का पता लगाकर उसके कारण को समझकर उसके
निग्रह का उपाय खोजकर अनुकूल उपचार करना चाहिए।
९४९. वैद्य को रोगी की आयु, रोग की मात्रा तथा काल का ध्यान
रखकर उपचार करना चाहिए।
९५०. रोगी, वैद्य, औषधि तथा उसे देनेवाला—इन चार विभागों का
विश्लेषण ही वैद्यक-शास्त्र में होता है।