तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 238, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ९४ तिरुक्कुरळ 213
९४. जुआ
९३१. विजय ही क्यों न प्राप्त हो, जुए की इच्छा न रक्खो, क्योंकि
वह विजय बन्सी के लोहे को मछली के निगलने के
समान होती है।
९३२. एक प्राप्त करके सौ खोनेवाले जुआरी के लिए सफल जीवन
व्यतीत करने का कोई मार्ग भी है क्या ?
९३३. कोई लुढ़कनेवाले पाँसे से प्राप्त होनेवाले धन की सदा चर्चा
छेड़ता रहे तो धन उसे छोड़ शत्रु के ही हाथ जा लगेगा।
९३४. अनेक बाधाएँ पहुँचाकर सम्मान को नष्ट करनेवाले जुए से बढ़कर
दरिद्रता उत्पन्न करनेवाला और कोई नहीं है।
९३५. पांसा, जुआ-घर तथा अपने हाथ (के द्यूत-कौशल) के अभिमान
को न छोड़नेवाले निर्धन होकर रहेंगे।
९३६. जुआ नामक दुर्भाग्य से आवृत्त व्यक्ति उदर-क्षुधा से
व्यथित होंगे।
९३७. जुआ-घर में पैर रखना पैतृक सम्पत्ति एवं सदाचार का
नाश करेगा।
९३८. जुआ धन का नाश करके असत्य भाषण कराकर हृदय को भी
भ्रष्ट करके विपत्तियों को ला देगा।
९३९. वस्त्र, धन, भोजन, यश और विद्या—ये पाँचों जुए में हाथ
डालनेवाले के पास नहीं फटकेंगे।
९४०. धन-विसर्जन के साथ साथ मोह की वृद्धि करनेवाले जुए के ही
समान, विपत्ति के आधिक्य के साथ साथ प्रियतर होते
जाते हैं प्राण।