तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ९३ तिरक्कुरळ 211
९३. मद्य-निषेध
९२१. मद्य-प्रेमियों से शत्रु कभी नहीं डरेंगे। वे (मद्य-प्रेमी) अपना
यश भी खो बैठेंगे।
९२२. मद्यपान कोई न करे। चाहें तो वे पान करें जो बड़ों के
सम्मान की इच्छा नहीं करते।
९२३. मद्यपान माता के मुख को ही अप्रसन्न कर देता है,
तो बड़ों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
९२४. 'लज्जा' नामक अच्छी महिला 'मद्य' नामक अशुभ व भयंकर
दोष से युक्त व्यक्ति के सामने नहीं आवेगी।
९२५. धन देकर (मद्यपान के द्वारा) अपने शरीर की विस्मृति को
मोल लेना अपने कर्मों की अज्ञानता ही है।
९२६. निद्रित व्यक्ति मृत व्यक्ति से भिन्न नहीं हैं। मद्यपान
करनेवाले वस्तुतः ज़हर पीनेवाले ही हैं।
९२७. चोरी-चोरी मद्यपान करनेवाले नगर के लोगों द्वारा ज्ञात होकर
सदा छिपे-छिपे हँसे जायेंगे।
९२८. (मद्यपान करनेवाला) यह कहना छोड़ दे कि मुझे मद्यपान का
अनुभव नहीं है (क्योंकि उससे) हृदय में छिपी हुई बात भी
स्पष्टतः व्यक्त हो जाती है।
९२९. पिये हुए व्यक्ति को कारण दिखा कर ठीक मार्ग पर लाने का
प्रयत्न करना पानी के नीचे डूबे हुए व्यक्ति को दीपक लेकर
ढूँढ़ने के समान होता है।
९३०. पिये हुए व्यक्ति को बिना पिये कोई देखे तो क्या वह
पीने पर होनेवाली बुरी दशा का विचार नहीं करेगा?