तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ९२ तिरुक्कुरळ २०९
९२. बिकाऊ स्त्री (वेश्या)
९११. प्रेम की इच्छा न रखकर धन की इच्छा रखनेवाली चतुर
स्त्रियों के मधुर बोल अन्त में दुखद ही होते हैं।
९१२. स्वलाभ को तौल कर मीठा बोलनेवाली आचरणहीन स्त्री से
सोच-समझ कर अलग ही रहना चाहिए।
९१३. धन-लोलुप स्त्रियों का झूठा आलिंगन अँधेरे कमरे में अपरिचित
शव के आलिंगन के समान ही होता है।
९१४. केवल धन (रुपये-पैसे) को धन माननेवाली स्त्रियों के तुच्छ
सौन्दर्य का स्पर्श कर्मों की पवित्रता के ज्ञाता कदापि
न करेंगे।
९१५. ज्ञान-सम्पन्न विशिष्ट बुद्धिमान सामान्य स्त्री के तुच्छ सौन्दर्य का
स्पर्श न करेंगे।
९१६. अपने शुभ की रक्षा करनेवाले नृत्य-गान के अहंकार से युक्त
तुच्छ सौन्दर्य की रक्षा में लीन वेश्याओं के कन्धों का
आलिंगन कभी न करेंगे।
९१७. जो दृढ़ हृदय नहीं होते वे ही उन स्त्रियों का आलिंगन करेंगे
जो दूसरों का प्रेम हृदय में रखकर शरीर सुख प्राप्त
करती हैं।
९१८. मायाविनी स्त्रियों का सम्भोग उनके लिए मोहिनी का जाल
माना जाता है जिनमें विवेचना बुद्धि नहीं होती।
९१९. आचरणहीन सामान्य स्त्री का कोमल कंधा अज्ञानी पतितों के
डूबने का नरक होता है।
९२०. लक्ष्मी से परित्यक्त व्यक्ति का सम्बन्ध उभय हृदयवाली स्त्री,
मद्य तथा जुए से होता है।
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