सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 334 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 230

अध्याय ९० तिरुक्कुरळ 205
९०. बड़ों का अपमान न करना
८९१. कर्मठ की कार्यतत्परता की निन्दा न करना सब विघ्नों से अपनी
रक्षा चाहनेवाले का सर्वश्रेष्ठ बचाव है।
८९२. बड़ों का सम्मान न करना उन्हीं बड़ों के द्वारा अत्यधिक हानि
उत्पन्न करेगा।
८९३. जो अपना नाश चाहे वह, बिना पूछे, उनसे विरोध उत्पन्न कर
ले जो तुल जाने पर किसी का नाश करके ही छोड़ते हैं।
८९४. शक्तिमान को शक्तिहीन का हानि पहुँचाना अपने हाथों यम को
आवाहन करना है।
८९५. महान सम्राट् से कटु विरोध मोल लेकर कोई चाहे कहीं
चला जाय, उसकी रक्षा नहीं हो सकती।
८९६. आग से जलने पर भी कोई बच सकता है, परन्तु बड़ों का
अपमान करनेवाले का कहीं कोई बचाव नहीं है।
८९७. यदि कोई गुण-सम्पन्न व्यक्ति का क्रोध-भाजन हो गया
तो विविध ऐश्वर्यों से युक्त जीवन एवं अत्यधिक धन से
उसे क्या लाभ?
८९८. पर्वत सदृश व्यक्ति यदि किसी का नाश चाहेंगे तो स्थिर
जीवन व्यतीत करनेवाले भी सकुदुम्ब नष्ट हो जायेंगे।
८९९. श्रेष्ठ सिद्धान्तों के व्यक्ति क्रोधित हुए तो सम्राट् भी बीच से
टूट कर राज्य-नाश को प्राप्त होगा।
९००. यदि श्रेष्ठ तपस्वी किसी पर रुष्ट हो गये तो अति विशिष्ट
सहायता प्राप्त व्यक्ति भी बच नहीं सकता।