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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 334 में से

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पृष्ठ 216

अध्याय ८३ तिरुक्कुरळ् 191
८३. झूठी मित्रता
८२१. हृदय से दूरस्थ पर वाह्यतः अभिन्न मैत्री अनुकूल अवसर पर
आघात करने के लिए निहाई है।
८२२. वाह्यतः वन्धु वने रह कर हृदय से जो वन्धु नहीं होते उनकी
मित्रता वेश्याओं के मन के समान अस्थिर होती है।
८२३. अनेक सद्ग्रन्थों के अध्ययन पर भी सुन्दर मन से युक्त होना
शत्रु-स्वभाववालों के लिए असम्भव होता है।
८२४. मुख पर मधुर हास्य सहित रह कर मन में वंचना से युक्त
रहनेवाले व्यक्तियों से सतर्क रहना चाहिए।
८२५. जिससे मन न मिले उसके शब्दों को मान कर किसी भी विषय पर
विश्वास न लाना चाहिए।
८२६. मित्र के समान (लाभप्रद व) अच्छे विपयों को कहने पर भी
शत्रुओं के वचन तुरन्त पकड़े जायेंगे।
८२७. धनुष का झुकाव विघ्न-सूचक होने के कारण विरोधियों के
विनम्र शब्दों के वश में न पड़ो।
८२८. शत्रु के विनय-सम्पन्न कर में शस्त्र छिपा रह सकता है, और
उसी प्रकार उसके रुदन के अश्रु भी होते हैं।
८२९. वाह्यतः अति मैत्री अभिव्यक्त करके हृदय में निन्दा का भाव
रखने वालों को हँसा कर अपना सम्बन्ध उनके साथ रहकर ही
समाप्त कर डालो।
८३०. शत्रु के मित्र वनाने का समय आवे तो हृदय रहित मुख-मैत्री
रख कर (पुनः) उसे भी तजो।