तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 214, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ८२ तिरुक्कुरळ् 189
८२. निकृष्ट मित्रता
८११. प्रेममय-सा प्रतीत होने पर भी असभ्य व्यक्ति की मित्रता का
घनिष्ठ होने से शिथिल पड़ना रुचिकर होता है ।
८१२. अपना कुछ बनते समय मित्र होकर, अन्यथा बिछुड़ जानेवाली
असम्बद्ध मित्रता की प्राप्ति से क्या लाभ, और टूट जाने से
क्या हानि ?
८१३. स्वलाभ को मापनेवाले मित्र, धनाश्रित वेश्याएँ और लुटेरे
समान हैं ।
८१४. युद्ध-क्षेत्र में योद्धा को गिराकर भाग जानेवाले मूढ़ अश्व जैसे
व्यक्ति की मित्रता की अपेक्षा एकाकी रहना श्रेयस्कर है ।
८१५. रक्षा करने पर भी रक्षित न रहनेवाले तुच्छ व्यक्तियों की
निकृष्ट मैत्री का होने से न होना अच्छा है ।
८१६. मूढ़ की अति अनिष्ट मैत्री की अपेक्षा बुद्धिमान की शत्रुता करोड़
गुना लाभदायक है ।
८१७. वाह्यतः हँसमुख रहनेवाले की मित्रता की अपेक्षा शत्रुओं की
घृणा दस करोड़ गुना लाभदायक है ।
८१८. सम्भव कर्म को भी असम्भव बना डालनेवालों की मित्रता को
बिना उनसे कहे ही शिथिल पड़ने दो ।
८१९. करनी कुछ और कथन कुछ होनेवाले का सम्बन्ध स्वप्न में
भी नहीं रुचेगा ।
८२०. घर में अकेले में मित्रता प्रकट करके भरी सभा में निन्दा
करनेवाले का सम्पर्क तनिक भी न रहने दो ।