तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ८१ तिरुक्कुरळ् 187
८१. चिर-परिचय
८०१. चिर-परिचय उसे कहते हैं कि जो साधिकार किये हुए किसी
कर्म को नीचे न गिरा कर स्वीकार करनेवाली मित्रता हो ।
८०२. मित्रता का लक्षण है अधिकारयुक्त कर्म। उसको स्वीकार
करना बुद्धिमान का कर्त्तव्य है ।
८०३. चिर-परिचित मित्रता से क्या प्रयोजन यदि ( मित्र के )
अधिकारपूर्ण किये हुए कर्म को स्वयं किया हुआ जैसा
न माना ?
८०४. बिना पूछे मित्र साधिकार कोई काम करे तो उसे अपनी
इच्छा के अनुकूल किया हुआ मानकर स्वीकार कर लेंगे ।
८०५. मित्र कोई दुःखप्रद कर्म कर बैठे तो उसका कारण अज्ञान
अथवा विशिष्ट अधिकार समझें ।
८०६. ( अधिकारपूर्ण मित्रता की ) सीमा में स्थिर रहनेवाली विषम
परिस्थिति में भी चिर-परिचित स्थाई सम्बन्ध को न छोड़ेंगे ।
८०७ स्नेह की परम्परा से युक्त मित्रतावाले व्यक्ति अपने मित्र
द्वारा किसी दुःखप्रद कर्म के बन पड़ने पर उससे
स्नेहच्युत न होंगे ।
८०८. अनन्य मित्र के दोष को न सुननेवाले अधिकारपूर्ण व्यक्ति
के लिए, उसका मित्र किसी दिन कोई दोष कर बैठे तो
वह दिन सप्रयोजन हो होगा ।
८०९. अधिकारपूर्ण चिर-परिचित मित्र की मित्रता को न छोड़नेवाले की
प्रशंसा संसार में बढ़ेगी ।
८१०. शत्रु भी उसको चाहेंगे जो चिर-परिचित मित्र से (उनके
दोषों पर भी) अपने सदाचरण के आधार पर कभी
पृथक नहीं होते ।