तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 210, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ८० तिरुक्कुरळ 185
८०. मित्रता का विवेचन
७९१. मित्र बनने के पश्चात् स्नेहपूर्ण व्यक्ति के लिए स्वतन्त्रता
नहीं रहती। अतः विवेचन के बिना मित्र बनने से बुरा
और कुछ नहीं है।
७९२. पूर्ण विवेचन के बिना मित्रता स्थापित करना अन्त में
मृत्यु की ही कारण-भूत बाधा उपस्थित करेगा।
७९३. गुण, वंश, दोष, तथा स्थाई बन्धुओं के स्वभाव को समझकर
मित्रता करनी चाहिए।
७९४. जिसने उच्च कुल में जन्म लिया हो, और जो अपने दोषों पर
लज्जित होता हो उसके साथ धन देकर भी मित्रता कर
लेनी चाहिए।
७९५. (आवश्यकता पड़ने पर) रुलाकर अथवा डाँट-डपटकर लोक-
रीति का ज्ञान करानेवाले व्यक्ति की मित्रता को सद्-विवेचन से
सदा ग्रहण करो।
७९६. विनाश में भी एक प्रयोजन निहित है। वह मित्र के
स्वभाव की विशालता का माप-दण्ड है।
७९७. मूर्ख की मित्रता छोड़ उससे पृथक होना मनुष्य के लिए
विशिष्ट आय है।
७९८. उत्साह को विदीर्ण करनेवाले कर्मों का विचार न करो।
और विषम परिस्थिति में साथ छोड़ बैठनेवाले की मित्रता से
दूर रहो।
७९९. पतन के समय साथ छोड़ बैठनेवाले की मित्रता का
मृत्यु-काल में स्मरण आने पर हृदय तप्त हो उठेगा।
८००. निर्मल स्वभाववाले व्यक्ति की मित्रता प्राप्त करो। कुछ देकर
ही सही, असम्बद्ध व्यक्ति की मित्रता को छोड़ो।
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