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सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 334 में से

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पृष्ठ 204

अध्याय ७७ तिरुक्कुरळ 179
५. सैन्य
७७. सैन्य-सौष्ठव
७६१. विभिन्न अंगों से पुष्ट, बाधाओं से अविचलित विजयप्रद सेना
सम्राट् की सम्पत्तियों में सर्वश्रेष्ठ होती है।
७६२. निर्बल पड़ते समय भी बाधाओं से निर्भय रहकर स्वयं प्रहार
सहने का शौर्य परम्परागत सेना के अतिरिक्त अन्यत्र
असम्भव है।
७६३. चूहों के सैन्य-सागर के गर्जन से क्या हो सकता है ? काले
नाग के श्वास मात्र से उसका सर्वनाश हो जायगा।
७६४. क्षतिग्रस्त हुए बिना शत्रुओं की वंचना में न आकर परम्परागत
शौर्य से युक्त हो तो वही सेना उत्तम है।
७६५. स्वयं यम के सक्रोध आक्रमण करने पर भी संघटित हो सामना
करने के शौर्य से युक्त हो तो वही उत्तम सेना है।
७६६. शौर्य, सम्मान, श्रेष्ठ व्यावहारिकता तथा उत्साहवर्द्धन—ये चारों
ही सैन्य के लिए श्रेष्ठ रक्षक हैं।
७६७. अपने पर चढ़ आये हुए सैन्य को रोककर उसकी चाल से
अवगत हो उस सेना के सम्मुख अग्रसर होनेवाली सेना ही
उत्तम सेना है।
७६८. संहारक हाथ तथा शौर्य के अभाव में भी सेना अपने
आलंकारिक प्रदर्शन मात्र से प्रशंसा प्राप्त करती है।
७६९. क्षीणता, स्थाई घृणा एवं निर्धनता न हो तो सेना की विजय
निश्चित है।
७७०. स्थाई वीर अनेक होने पर भी सेना का नायक न हो तो वह
सेना ही नहीं हैं।