तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७५ तिरुक्कुरळ 175
७५. दुर्ग
७४१. कर्मठ (आक्रमणकारियों) के लिए दुर्ग महत्त्वपूर्ण होता है, और
उनके लिए भी जो भयभीत हो अपनी रक्षा करना चाहते हैं ।
७४२. माणिक्य-सा स्वच्छ जल, (विशाल) भूभाग, (ऊँचे) पर्वत,
सुन्दर व शीतल छाया से युक्त वन—इन चारों से युक्त
होता है दुर्ग ।
८४३. ऊँचाई, चौड़ाई, दृढ़ता तथा दुर्जयत्व—इन चारों से सम्पन्न होने
पर ही ग्रन्थ उसे 'दुर्ग' मानेंगे ।
७४४. सुरक्षा के छोटे स्थान व अतिरिक्त-विशाल स्थल से युक्त
तथा आक्रमणकारी शत्रु के उत्साह को विदीर्ण करनेवाला
होता है दुर्ग ।
७४५. शत्रुओं के लिए अजेय, खाद्य-सम्पन्न तथा भीतर उपस्थित
व्यक्तियों की सुविधाओं से युक्त होता है दुर्ग ।
७४६. सभी आवश्यक पदार्थों से सम्पन्न तथा विषम परिस्थिति में
सहायता प्रदान करने योग्य वीरों से युक्त होता है दुर्ग ।
७४७. घेर कर अथवा घेरा डाले बिना संग्राम से व वंचना से किसी
प्रकार जो हस्तगत न हो सके, वही होता है दुर्ग ।
७४८. अपनी प्रवीणता से घेरा डालनेवाले शत्रुओं पर भी भीतर
ही सुदृढ़ रह कर विजय प्राप्त कराने की शक्ति से युक्त
होता है दुर्ग ।
७४९. समर-संकट में भी शत्रु का नाश करते हुए भीतर उपस्थित
व्यक्तियों के विभिन्न कर्मों के द्वारा विजय प्राप्ति की सुप्रशंसा से
सम्पन्न होता है दुर्ग ।
७५०. चाहे जैसे गुणों से युक्त क्यों न हों, यथानुकूल विशिष्ट कर्म से
रहित व्यक्तियों के लिए व्यर्थ ही होता है दुर्ग ।