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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 334 में से

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पृष्ठ 188

अध्याय ६९ तिरुक्कुरळ 163
६९. दूत
६८१. स्नेह-सम्पन्नता, उत्तम कुल में जन्म तथा सम्राट् के इच्छानुकूल
सदाचरण दूत के लिए आवश्यक गुण हैं।
६८२. प्रेम, बुद्धि, विचारपूर्ण वाक्-शक्ति—ये तीनों दूतों के लिए
आवश्यक हैं।
६८३. अपने सम्राट् की विजय के हेतु दूसरे सम्राटों के पास जानेवाले
दूत में विद्वानों से भी सम्मानित होनेवाली विद्वत्ता होनी
चाहिए।
६८४. बुद्धि, रूप तथा गम्भीर अध्ययन—तीनों एक साथ जिसमें हों
वही दूत बन कर जावे।
६८५. अप्रिय शब्दों को हटाकर शृंखलाबद्ध कह कर अपने भाषण से
प्रसन्न करके प्रयोजन सिद्ध करनेवाला ही दूत है।
६८६. सफल दूत वही है जो विज्ञ हो, निडर हो, हृदयवेधक वक्ता
हो और जिसमें प्रत्युत्पन्नमति हो।
६८७. श्रेष्ठ दूत वही है जो कर्तव्यनिष्ठ हो, और देश-काल का
विचार रखकर ध्यान से शब्द व्यक्त करता हो।
६८८. सदाचरण, सहयोग एवं सुनिश्चय—इन तीनों गुणों में
सिद्ध होना दूत के लिए आवश्यक है।
६८९. अपने सम्राट् का सन्देश दूसरे सम्राट् से कहने की योग्यता
उसी दूत में होगी जो सदोष शब्दों को मुँह के थकने पर
भी सधैर्य किसी प्रकार अभिव्यक्त न करे।
६९०. मरण-संकट में भी निर्भय हो अपने सम्राट् को ही
श्री-सम्पन्न करानेवाला ही दूत है।