सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 334 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 186

अध्याय ६८ तिरुक्कुरळ 161
६८. कर्म करने की रीति
६७१. उपाय के विचार की समाप्ति दृढ़ निश्चय करने में निहित है,
और फिर उस दृढ़ निश्चय में शिथिलता लाना अथवा विलम्ब
करना हानिकारक है।
६७२. विलम्ब की आवश्यकता हो तो विलम्ब से ही कर्म करो।
जहाँ विलम्ब के लिए स्थान न हो उसे अविलम्ब करो।
६७३. जहाँ-जहाँ सम्भव हो, कर्म को पूर्ण कर डालना अच्छा है।
सम्भव न हो तो साफल्यप्रद पथ को देखकर उसके
पथिक बनो।
६७४. कर्म एवं शत्रुता—इन दोनों के अवशिष्ट अंश का विचार
करने पर ज्ञात होगा कि वे अग्नि के अवशिष्ट अंश के समान
(बढ़ कर) विनाशकारी होंगे।
६७५ धन, साधन, समय, कर्म तथा स्थान के साथ इन पाँचों का
स्पष्टतः विचार करके किसी कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए।
६७६. कर्म को सम्पन्न करने की रीति, सम्भाव्य बाधाएँ तथा सफल
होने पर प्राप्य विशिष्ट प्रयोजन को देखकर उक्त कर्म में प्रवृत्त
होना चाहिए।
६७७. कर्म को सम्पन्न करने का मार्ग यही है कि उस कर्म के मर्मज्ञ के
विचारों को समझें।
६७८. एक कर्म से दूसरा कर्म भी सिद्ध कर लेना मद से आर्द्र
कपोलों से युक्त एक हाथी के द्वारा दूसरे हाथी को पकड़ने के
समान होता है।
६७९. मित्रों की भलाई करने की अपेक्षा शत्रुओं के साथ सम्बन्ध