तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६४ तिरुक्कुरळ 153
२-सामन्त
६४. मन्त्रित्व
६३१. साधन, काल, कर्म तथा उसके करने की विशिष्ट रीति के ज्ञान से
सुसम्पन्न होता है मन्त्रित्व ।
६३२. निर्भयता, कुलीनता, संरक्षण की शक्ति, अध्ययन का ज्ञान तथा
दृढ़ प्रयास—इन पाँचों गुणों से सुसम्पन्न होता है मन्त्रित्व ।
६३३. (आवश्यकतानुसार) सम्बन्ध-विच्छेदन, संरक्षण तथा पृथक
हुए व्यक्ति को पुनः मिला लेने की शक्तियों से सुसम्पन्न
होता है मन्त्रित्व ।
६३४. विभिन्न विषयों को समझने की विशिष्ट शक्ति, विश्लेषणयुक्त
विशिष्ट कर्म तथा अपने अभिप्राय को निर्भयतापूर्वक कहने की
शक्ति से सुसम्पन्न होता है मन्त्रित्व ।
६३५. धर्मज्ञ ज्ञान-सम्पन्न वक्ता व सदा शक्ति को समझनेवाला
मर्मज्ञ मन्त्री (व मित्र) होता है ।
६३६. ग्रन्थ-ज्ञान के साथ तीक्ष्ण बुद्धि प्राप्त व्यक्ति के सम्मुख आ
खड़ी होनेवाली अति रहस्यपूर्ण समस्या हो क्या सकती ?
६३७. कर्म करने की विधि समझ लेने पर भी लोक व्यवहार को
समझकर उसे यथानुकूल करना चाहिए ।
६३८. (सम्राट् दूसरों के) ज्ञान का संहार करके स्वयं भी अज्ञानी
बना रहे तो भी न्याय को दृढ़तापूर्वक व्यक्त करना निकट
उपस्थित अमात्य का कर्त्तव्य है ।
६३९. बाधा उपस्थित करने का विचार करनेवाले मन्त्री से सात करोड़
शत्रुओं के निकट रहने में ही भला है ।
६४०. दृढ़ता जिनमें नहीं होती, वे नियमपूर्वक कर्म को प्रारम्भ करने
पर भी उसे सफलता के साथ पूर्ण न कर पायेंगे ।
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