तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६३ तिरुक्कुरळ 151
६३. दुःख में अधीर न होना
६२१. दुःख आ पड़ने पर मुस्कराओ। उसका सामना करके विजयी
होने का साधन इसके समान और कोई नहीं है।
६२२. बाढ़ के समान आनेवाला दुःख बुद्धिमान के अपने हृदय में विचार
करने मात्र से नष्ट हो जायगा।
६२३. दुःख से दुःखित न होनेवाले उस दुःख को ही दुखित कर
देंगे।
६२४. अवरोधित सभी मार्गों में (गाड़ी को) खींच ले जानेवाले वृषभ के
समान प्रयत्नशील व्यक्ति पर आया हुआ दुःख ही दुखित
होता है।
६२५. निरन्तर दुःख आ पड़ने पर भी निरुत्साहित न होनेवाले पर
आया हुआ दुःख ही दुखित होगा।
६२६. धन-प्राप्ति पर लोभ सहित उसकी रक्षा न करनेवाले उसके जाने
पर अति दुःखित हो क्योंकर विचलित होंगे ?
६२७. श्रेष्ठ व्यक्ति शरीर को दुःख का स्थल मानकर दुःख के आ
पड़ने पर विचलित नहीं होते।
६२८. सुख की इच्छा न करनेवाला व दुःख को स्वाभाविक माननेवाला
दुःख के आ पड़ने पर दुखित नहीं होता।
६२९. सुख में सुखी हो उसकी इच्छा न करनेवाला दुःख में
दुःखी हो विचलित न होगा।
६३०. कोई दुःख को ही सुख मान ले तो शत्रु द्वारा भी
प्रशंसित होने का सम्मान उसे सिद्ध होगा।